कार्यक्रम

  • किसानों को कार्बनिक खेती का प्रशिक्षण देना। पानी की व्यवस्था करना।
  • निर्धन ग्रामीणों को गाय के गोबरमूत्र, कार्बनिक व अकार्बनिक खाध और वाणिजियक उत्पादों यथा शैम्पू, साबुन, पेन्ट आदि बनाने का प्रशिक्षण देना, अर्थात उन्हें रोजगार दिलाना।
  • ग्रामीण स्तर पर बच्चों को स्कूली शिक्षा उपलब्ध कराना। 
  • प्रोत्साहन परीक्षाओं द्वारा पुरस्कार देकर प्रोत्साहित करना।
  • शहरों में उच्च शिक्षा हेतु प्रोत्साहन राशियाँ उपलब्ध कराना।
  • स्कूल कालेजों की स्थापना करना।
  • विश्वविधालयों को प्रोत्साहित करना।
  • विश्वविधालयों की स्थापना करना।
  • प्राथमिक से विश्वविधालय तक विधार्थियों के खेल प्रोत्साहित करना।
  • स्वास्थ्य रक्षा एवं श्री वृद्धि करना।
  • नैतिक शिक्षा द्वारा जिम्मेदार नागरिक बनाना।
  • धार्मिक क्रियाओं द्वारा आस्थावान बनाना।
  • धार्मिक, एैतिहासिक व साहित्यक पर्यटन को बढ़ावा। 
  • महिलाओं के लिए कुटीरगृह उधोग स्थापित करना समिति कार्यालय में ग्रामीण एवं ब्लाक स्तर पर लोगों की स्थानीय व व्यकितगत समस्याओं के समाधान में सहयोग करना ।

 

प्0 रामनारायण शर्मा अनुसंधान न्यास द्वारा
सन 1982 से 2007 तक
प्रति एक लाख रूपया से सम्मानित वैधगण
न्यास अध्यक्ष - पं0 विश्वनाथ शर्मा

 
 
क्रं0सं0 सम्मानित वैध महामहिम जिनके द्वारा सम्मानपुरस्कार दिये गये
 
 
 1.  सन 1982 वैध पं0 दामोदर शर्मा गौड (वाराणसी)लोक सभाध्यक्ष श्री बलराम जाखड़
 2.  वैध पं0 हरिदत्त शास्त्री (बम्बई) स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री श्री बी0 शंकरानन्द
 3.  वैध प्रियव्रत शर्मा (पटना-बिहार) राष्ट्रपति श्री ज्ञानी जैल सिंह
 4.  वैध रणजीत सिंह देसाई (सूरत-गुजरात) राष्ट्रपति श्री ज्ञानी जैल सिंह
 5.  वैध विनायक ठाकुर प्रधानमंत्री श्री पी0वी0 नरसिम्हाराव
 6.  वैध विश्वनाथ द्विवेदी (वाराणसी) प्रधानमंत्री श्री पी0वी0 नरसिम्हा राव
 7.  वैध पी0 जे0 देशपाण्डेय(नागपुर) प्रधानमंत्री श्री पी0वी0 नरसिम्हा राव
 8.  वैध ज्योतिरमित्र (वाराणसी) प्रधानमंत्री श्री पी0वी0 नरसिम्हा राव
 9.  वैध बृहस्पतिदेव त्रिगुणा (दिल्ली) प्रधानमंत्री श्री पी0वी0 नरसिम्हा राव
10. वैध रामनिवास शर्मा (हैदराबाद) प्रधानमंत्री श्री पी0वी0 नरसिम्हा राव
11. वैध यदुनन्दन उपाध्याय (वाराणसी) प्रधानमंत्री श्री पी0वी0 नरसिम्हा राव
13. वैध पं0 शिवशंकर शर्मा छगांणी(नागपुर) प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी
14. वैध श्री राम शर्मा (बम्बई) प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी
15. वैध पी0वी0एन0 कुरूप(जामनगर-गुजरात) प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी
16. वैध सु.श्री प्रेमवती तिवारी(वाराणसी) प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी
17. वैध एच.एस. कस्तुुरे(अहमदाबाद) राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभाताई पाटिल
18. वैध सुरेश चन्द्र चतुर्वेदी (मुंबई) राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभाताई पाटिल
19. वैध प्रो0 आर0एच0 सिंह(वाराणसी) राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभाताई पाटिल
20. वैध मायाराम उनयिल (नोएडा) राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभाताई पाटिल
21. सन 2007 वैध टी0 एल0 देवराज (बैंगलौर) राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभाताई पाटिल
 

श्री लक्ष्मी व्यायाम मंदिर, झाँसी
उदभव और विकास
1933 - 2014

बुन्देलखण्ड सेवा मण्डल (पंजीकुत) द्वारा संचालित

श्री लक्ष्मी व्यायाम मंदिर, झाँसी 

अपनी स्थापना काल 1993 के पूर्व अन्ना जी पचकुईयाँ, झाँसी में सिथत गौशाला में चलने वाली व्यायामशाला में लेझिम, लाठी, योग आदि का प्रशिक्षण प्राप्त करने तथा प्रशिक्षण देने का कार्य करते थे। जब अन्ना जी गौशाला व्यायाम शाला जाते थे तभी अंग्रेजों की शोषण नीति के कारण अन्ना जी ने 1930 में क्रानितकारियों का साथ देने लगे और इसी समय उन्होंने रेलवे की टाईम कीपर की नोकरी से त्याग पत्र दे दिया। अन्ना जी के साथ उनके साथी श्री कालूराम राय, श्री जगन्नाथ  मुखरैया तथ हरचरन से भी व्यायाम करने जाने लगे थे। चूँकि गौशाला में महाराष्ट्र समाज के लोगो  का वर्चस्व था अत: अन्ना जी को कहा गया कि केवल मराठी ही व्यायामशाला आ सकते हैं और इन तीनों में सिर्फ अन्ना जी मराठी थे। इस पर 17 वर्षीय अन्ना जी नाराज होकर अपने साथियों को लेकर वर्तमान संस्था की तत्कालीन ऊबड़-खाबड़ भूमि में उत्तरी भाग पर (जहाँ वर्तमान में इण्टर कालेज का हीर भवन  है) के मालिक, श्री बाबूलाल खजांची एवं श्री मुरलीधर अग्रवाल थें की बेकार भूमि पर जोड़ी लेझिम, लाठी, जामिबया, एवं योगासन का अभ्यास 18 जून 1933 से प्रारम्भ किया और इस संस्था का नाम महारानी लक्ष्मीबार्इ रखा। स्थापना के समय अन्ना के साथ उपरोक्त साथियों के अलावा श्री पुरूषोत्तम नारायण जोशी भी समिमलित हुये। संस्था संचालक समिति के के प्रथम सभापति बने श्री भोलानाथ, जो एक अच्छे खिलाड़ी, सुप्रसिद्ध वकील एवं झाँसी के स्काउट कमिश्नर थे। स्थापना  के पश्चात कार्यकर्ताओं ने 1935 में सबसे पहले 61 रू0 50 पैसे चन्दा एकत्रित करके व्यायाम शाला के लिए बांस का एक टपरा (झोपड़ी) तैयार किया और एक मलखम्भ बनवाया।
1936 में अन्ना जी ने एक राइफल क्लब की स्थापना  की जिसमें संस्था के 20 सदस्य समिमलित थे तथा महिलाओं की एक महारानी लक्ष्मीबाई महिला बि्रगेड की भी स्थापना की।
1935-36 में श्री रामसेवक नायक, पं0 राम सहाय शर्मा, श्री परमानन्द विरथरे, श्री नवल किशोर सिंघल, श्री रामचन्द्र वसंल, श्री रामसेवक अग्रवाल, श्री प्रभूदयाल रिछारिया, श्री बालकृष्ण अग्रवाल, श्री परमानन्द, श्री धनीराम कुशवाहा तथा श्री नरेश चन्द्र अग्रवाल सकि्रय हो गये। अब अन्ना जी का कार्य न केवल व्यायामशाला संचालन रह गया था वरन अंग्रेजी शासन की खिलाफत करना स्वतंन्त्रता के आन्दोलन में भाग लेना भी था। अन्ना जी झाँसी और इसके आस-पास मध्य प्रदेश के क्षेत्रों में पैदलसाइकिल से अपने साथियों सहित जा-जाकर लेझिम, लाठी, जमिबया, मल्लखम्भ योगासन, भाला, तलबार आदि का प्रदर्शन करते एवं प्रशिक्षण देते थे। 
05.01.1938 को संस्था में विजय लक्ष्मी पणिडत पधारी। वह संस्था के छात्रों के व्यायाम प्रदर्शन से बहुत प्रभावित हुयी। इस असवर पर उपसिथत भूमि के मलिक श्री बाबूलाल खजांची ने संस्था को लगभग 1.35 एकड़ भूमि दान में देने की घोषणा की। चूंकि यह भूमि उनके परिवार की थी और यह भूमि बटवारें में श्री मुरलीधर अग्रवाल के हिस्से में आर्इ अत: उन्हाेंने भी इस हिस्से को संस्था को दान में दे दिया ।
1938 में ही संस्था के कार्यो एवं युवको द्वारा की जा रही  समाज सेवा एवं खेलों के प्रति रूचि से प्रभावित होकर नगर पालिका ने 10 रू0 प्रतिमाह की सहायता देना प्रारम्भ किया । इस समय संस्था के अध्यक्ष श्री बाबूलाल अग्रवाल एवं मंत्री श्री पुरूषोत्तम नारायण जोशी थे।
1941 में स्वतंत्रता आन्दोलन में अन्ना जी के जेल में रहने तक संस्था के महामंत्री श्री सीताराम नौगरैया बने। 1940-41 में ही श्री जयराम शर्मा ने संस्था में पदार्पण किया इसी समय श्री हीरालाल सुरैठिया एवं डा गोविन्द दास रिछरिया भी सकि्रया हुये।
1942 में बुन्देलखण्ड सेवा मंडल मातृ संस्था का शुभारम्भ हुआ तथा 1942 में सेवा मंडल के प्रथम अध्यक्ष श्री मुरलीधर अग्रवाल (खजांची) तथाप्रथम महामंत्री श्री पुरूषोत्तम जोशी बने। 1945 में संस्था के कार्यो से प्रभावित होकर प्रादेशीय सरकान ने संस्था को 1500 रू0 की वार्षिक सहायता दी तथा बाद में इसे बढ़ाकर 2500 रू0 वार्षिक कर दी।
1945 में उपन्यास सम्राट वृन्दावन लाल वर्मा एडवोकेट जो उस समय जिला बोर्ड के चेयरमैन थे संस्था को 500 रू0 की सहायता दिलार्इ बाद में इसे 25 रू0 प्रतिमाह कर दिया गया। श्री बालकृष्ण अग्रवाल के पश्चात श्री जयराम शर्मा संस्था प्रशासन की प्रमुख धुरी बने।
महारानी लक्ष्मीबाई  बलिदान जयन्ती समारोह सबसे पहले 1918 में गणेश मनिदर झाँसी में सुजन समाज के नेतृत्व में प्रारम्भ हुआ। चूंकि संस्था के संचालक सुतन समाज से जुडे़ थे और इस आयोजन को विस्तृत रूप से मनाना चाहते थे अत: 1935 में संस्था के ऊबड़-खाबड़ मैदान पर यह समारोह आयोजित किया गया यह कार्यक्रम तीन दिवसीय हुआ। तभी से राष्ट्रकवि घासीराम व्यास ने कवि सम्मेलन 18 जून को प्रारम्भ किया और इस कार्यक्रम से जुड़ गये।
1942 में सम्पूर्ण देश में अंग्रेजों का दमन चक्र चल रहा था ऐसी सिथति में किसी प्रकार का उत्सव मनाना या मीटिंग कर बहुत ही हिम्मत की बात थी परन्तु ऐसी परिसिथति में भी संस्था के कार्यकार्तासंचालक बराबर बलिदान जयन्ती समारोह आयोजित करते रहे। उत्सव के लिये महारानी जी के चित्र की आवश्यकता का अनुभव किया गया तो क्रानितकारी मास्टर रूद्रनारायण सिंह ने संस्था के लिए एक 3 फुट ऊँची तथा 5.12 इंच लम्बी सीमेन्ट की महारानी जी की सुन्दर मुर्ति बना दी जिसकी बहुत प्रशंसा हुयी इस मुर्ति का उदघाटन श्री मुरलीधर अग्रवाल ने श्री आत्माराम गोविन्द खेर की अध्यक्षता में किया।
इस छोटी मूर्ति से प्रभावित होकर संचालकों में बड़ी मूर्ति बनबाने का उत्साह उत्पन्न हुआ और इस शुभ कार्य के लिये के लिये 1944 में मुरलीधर अग्रवाल ने 500 रू0 देकर कार्य प्रारम्भ कराया जब मूर्ति बनकर तैयार हो बयी तो कानपुर के सेठ श्री रामरतन गुप्ता ने इस मूर्ति का अनावरण किया तथा संस्था को 5000 रू0 अनुदानित किये तथा मूर्ति निर्माता क्रानितकारी रूद्र नारायण सिंह को स्वर्ण पदक सम्मानित किया।
श्री मुरली धर अग्रवाल ने संस्था को जो भूमि दान में दी थी इसी भूमि से लगी अन्य भूमि अन्य परिवार की भी थी जो उन्होने किसी अन्य (महावीर प्रसाद अगिनहोत्री) को बेच दी जिन्होने इस क्रय की गयी भूमि पर सिनेमा घर बनाना प्रारम्भ कर दिया। इसका विरोध अन्ना जी व सम्पूर्ण व्यायामशाला समिति ने किया। उनसे आग्रह भी किया कि व्यायामशाला के बगल में सिनेमाघर न बनायें परन्तु सिनेमाघर निर्माता नहीं माने और निर्माण में डटे रहे। 17 मार्च 1947 को सिनेमाघर की दीवाारों को ध्वस्त करने के प्रयास में सर्व श्री अन्ना जी, रामसेवक अग्रवाल, परमानन्द, बालकृष्ण अग्रवाल, जयराम शर्मा, धनीराम, नवल किशोर सिंघल एवं सीताराम आजाद जेल में बन्द हो गये।
इसी क्रम में 18 मार्च 1947 रक्सा निवासी श्री देशराज निर्माण कालीन दीवार पर लेट गये और उन्होंने कहा कि दीवार मे हमें चिन दो और फिर दीवार उठाओं उनके पास झण्डा लेकर श्री परमानन्द विरथरे एवं रामसेवक नायक खड़े हो गये। उस समय जिलाधिकारी ने फायरिंग का आदेश दिया तो उपसिथत जनता ने विरोध करते हुये कहा कि किसी को गोली लगी तो झाँसी का बच्चा-बच्चा कुर्बान हो जायेगा। अन्त में श्री आत्माराम गोविन्द खेर और श्री धुलेकर जी के सतप्रयासों से प्रदेश सरकार ने मामले में हस्तक्षेप किया और निर्माण कार्य रोक दिया गया। बाद प्रशासन हस्तक्षेप मुकदमे वापिस हो गये। और वर्तमान में पूरी जमीन संस्था के नाम अधिग्रहीत करा दी गयी तथा 30000 रू0 देना निशिचत हुआ।
1947 में यह धन राशि बहुत अधिक थी इतनी धनराशि एकत्रित करना बड़ा कठिन कार्य था इसके लिये अन्ना जी अपने घर के जेवर बेचने को तैयार हो गये परन्तु संचालकों ने इसे स्वीकार नहीं किया और किसी तरह 5000 रू0 की धन राशि एकत्रित करके जमा की, जो एक प्रसिद्ध कांग्रेसी बालकृष्ण शर्मा ने दी थी। इस सुकार्य में श्री कृष्ण गोपाल शर्मा, सीताराम भगवत, राम गोपाल शास्त्री कालिका प्रसाद अग्रवाल, रघुनाथ विनायक धुलेकर, पन्नालाल शर्मा, कुंज बिहारी शिवानी आदि ने अभूतपूर्व सहयोग किया। इस प्रकार अन्ना जी के नेतृत्व में संस्था की भूमि का विस्तार प्रारम्भ हुआ। 1947 के बाद अन्ना जी ने व्यायाम के कार्यो को आगे बढ़ाया। तत्यकालीन अनेक कार्यकर्ताओं के साथ भारतीय व्यायाम, मल्लखम्भ का झाँसी जनपद आसपास के मध्य प्रदेश के ग्रामों व नगरों में प्रदर्शन किया। वहां के सहयोग से यथा सम्भव व्यायामशालायें खुलवायीं खेल कुदों के आयोजन हुये भूमि का धीरें-धीरें विस्तार किया गया। 1960-61 के बाद डा0 पं0 विश्वनाथ शर्मा जी, स्वर्गीय सीताराम गुप्त, कालूराम राय, रामसेवक अग्रवाल, बालकृष्ण अग्रवाल, चन्द्र किशोर शर्मा, धनीराम कुशवाहा, पुरूषेत्तम नारायण वर्मा एडवोकेट, नरेशचन्द्र अग्रवाल, दुर्गाप्रसाद, सुन्दरला महरोत्रा, रामसेवक नायक, आर्य पं0 रामनारायण शर्मा, बैध मूलचन्द्र सिकोरिया, रामदास वर्मा, लखनलाल मिश्रा, बिपिन बिहारी श्रीवास्तव, बाबूलाल लहारिया, गोविन्द सिंह, हरीहर शरण अग्रवाल, शंकर लाल लहारिया आदि के सकि्रय सहयोग से व्यायामशाला के मैदान का विस्तार किया खेल कूदों के आयोजन के साथ-साथ संस्था की मल्लखम्भ, योग, जिम्नासिटकस तथा भारतीय व्यायाम की टीमें प्रादेशिक व अखिल भारतीय स्तर पर प्रतिभाग करने लगी। 1961-62 में संस्था के कार्यकर्ता श्री परमानन्द जी व्यायाम, डिप्लोमा प्राप्त करने हेतु लखनऊ विश्वविधालय द्वारा संयुक्त राज्य अमेरिका भेजे गये।
1971 संस्था के कि्रया कलापों के विस्तार को ध्यान में रखकर '150x75 के जिम्नेजियम हाल का शिलान्यास पं0 रामनारयण शर्मा वैध के द्वारा किया गया । सन 1963 में संस्था ने पहला बड़ा आयोजन नवम राष्ट्रीय जिन्मासिटकस चैमिपयनशिप का आयोजन किया गया। इसके लिये युद्ध स्तर पर अकथ श्रमदान हुआ। बड़े-बड़े गडढों को भरा गया तथा झाड़-झक्कड़ साफ करके अनावश्यक वृक्षों को हटाकर विशाल मैदान तैयार किया गया इतने कम समय में जो श्रमदान आदि करके जो समतलीय करण एवं संस्था के सड़क के किनारे वाउण्डरी बाल बनायाी गये उसे देखकर झाँसी जनता के भूरि- भूरि प्रशंसा की । इस कार्य में डा0 पं0 विश्वनाथ शर्मा जी एवं सीताराम गुप्त जी के नेतृत्व में उनकी टीम के अनेक साथियों का  योगदान अविस्मरणीय है। 
1961 में घुमते हुये बोतल मल्लखम्भ का आविष्कार श्री सीताराम गुप्त एवं श्री नाथुलाल जी द्वारा हुआ । 1965-66 में महारानी लक्ष्मीबाई स्मृति अखिल भारतीय जिम्नासिटकस चैमिपयनशिप, 1978 में अखिल भारतीय विश्व दंगल, 1972 में विकास प्रदर्शनी 1975 में अखिल भारतीय जिम्नासिटकस चैमिपयनशिप, 1978 में अखिल भारतीय विश्व विधालीय जिम्नासिटकस एवं मल्लखम्भ चैमिपयनशिप आदि का सफल  आयोजन हुआ। 1981 से मेजर ध्यानचन्द स्मृति आल इणिडया गोल्ड कप हाकी टूर्नामेंट का आयोजन संस्था में 1991 तक हुआ। 1993 से 1998 तक पं0 रामनारायण शर्मा स्मृति हाकी टूर्नामेंट का आयोजन संस्था प्रांगण में हुआ। अनेकों बार इण्टर कालेज द्वारा माध्यमिक शिक्षा विभाग की हाकी, जिम्नासिटक, वालीबाल, खो-खो, कबडडी की प्रादेशिक प्रतियोगिताएँ आयोजित हो चुकी है तथा 2008 में कालेज द्वारा आल इणिडया बालीबाल प्रतियोगिता कराई गयी जो बहुत बड़ी उपलबिध रही। 2000-2001 में संस्था में दोबारा अखिल भारतीय मल्लखम्भ चैमिपयनशिप का भी आयोजन हुआ। संस्था में वर्तमान स्वरूप में श्री लक्ष्मी व्यायाम मनिदर इण्टर कालेज, महारानी लक्ष्मी बाई जू0 हाई स्कूलबालिका इण्टर कालेज, श्री लक्ष्मी व्यायाम मनिदर व्यायाम कालेज, श्री लक्ष्मी व्यायाम मनिदर का विशाल जिम्नेशियम हाल में जिम्नासिटकमल्लखम्भ खेल के विकास की पर्याप्त सुविधाऐं तथा विशाल मैदान उपलब्ध है।
संस्था अपनी मातृ संस्था बुन्देलखण्ड सेवा मंडल के अध्यक्ष पं0 विश्वनाथ शर्मा के नेतृत्व में उच्च कोटि के खेलकूदों, अनुशासित शैक्षिक वातावरण के लिये बुन्देलखण्ड में सुविख्यात है।
मैं सन 1969-70 में  कक्षा 11 का एस.पी.आई का छात्र था तो मुझे वहाँ के क्रीड़ाध्यक्ष श्री मूलचन्द्र जी सिकोरिया व्यायामशाला श्रमदान करने हेतु लिवा लाये। यहाँ के कार्यक्रम मुझे अच्छे लगे। गुप्ता जी भाई साहब से परिचय हुआ। कुछ समय पश्चात स्व0 भाई साहब गुप्ता जी से प्रभावित होकर मेरे पूज्य पिता स्व0 राम नारायण शर्मा जी ने विधालय के लिये क्रमश: निर्मित करा दिया तभी से मैं संस्था सकि्रय होता चला गया। सन 1980 के बाद मैं संस्था को प्रबन्ध समिति में सदस्य बल आज विगत 4 वर्षो से मुझे मातृ संस्था बुन्देलखण्ड सेवा मंडल का महामंत्री श्री बनने का सौभाग्य मिला है इस सुकार्य में संस्था अध्यक्ष डा0 पं0 विश्वनाथ शर्मा जी की प्रेरणा तथा मेरे स्व0 पिता श्री एवं गुरूदेव बडे़ भाई साहब का आशीर्वाद प्राप्त हैं।

 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी

      सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी
        गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी
         दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
                चमक उठी सन सत्तावन मेंए वह तलवार पुरानी थी
   बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
        खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

       कानपूर के नाना कीए मुँहबोली बहन छबीली थी
        लक्ष्मीबाई नामए पिता की वह संतान अकेली थी
          नाना के सँग पढ़ती थी वहए नाना के सँग खेली थी
             बरछी ढालए कृपाणए कटारी उसकी यही सहेली थी।
    वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
    खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

           लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार
        देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार
             नकली युद्ध.व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार
              सैन्य घेरनाए दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।
           महाराष्टर.कुल.देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी
 बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
      खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में
   ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में
     राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में
         सुभट बुंदेलों की विरुदावलि सी वह आयी झांसी में
          चित्रा ने अर्जुन को पायाए शिव से मिली भवानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
    खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

              उदित हुआ सौभाग्यए मुदित महलों में उजियाली छाई
     किंतु कालगति चुपके.चुपके काली घटा घेर लाई
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई
            रानी विधवा हुईए हाय! विधि को भी नहीं दया आई।
निसंतान मरे राजाजी रानी शोक.समानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
    खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

           बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषायाए
              राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया
     फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया
                   लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।
अश्रुपूर्णा रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी
  बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
       खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

                   अनुनय विनय नहीं सुनती हैए विकट शासकों की माया
         व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया
      डलहौज़ी ने पैर पसारेए अब तो पलट गई काया
  राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।
        रानी दासी बनीए बनी यह दासी अब महरानी थी
 बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
      खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

                छिनी राजधानी दिल्ली कीए लखनऊ छीना बातों.बात
           कैद पेशवा था बिठुर मेंए हुआ नागपुर का भी घात
                 उदैपुरए तंजौरए सताराए करनाटक की कौन बिसातघ्
                      जबकि सिंधए पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र.निपात।
     बंगालेए मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
    खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

     रानी रोयीं रिनवासों मेंए बेगम ग़म से थीं बेज़ार
      उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार
   सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार
               श्नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हारश्।
     यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
    खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

              कुटियों में भी विषम वेदनाए महलों में आहत अपमान
            वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान
 नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान
                   बहिन छबीली ने रण.चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।
         हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
     खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

        महलों ने दी आगए झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी
      यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी
         झाँसी चेतीए दिल्ली चेतीए लखनऊ लपटें छाई थी
    मेरठए कानपूरए पटना ने भारी धूम मचाई थी
               जबलपूरए कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
      खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

       इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम
            नाना धुंधूपंतए ताँतियाए चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम
                 अहमदशाह मौलवीए ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम
              भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।
          लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
     खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

      इनकी गाथा छोड़ए चले हम झाँसी के मैदानों में
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में
       लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचाए आगे बड़ा जवानों में
             रानी ने तलवार खींच लीए हुया द्वन्द्ध असमानों में।
       ज़ख्मी होकर वाकर भागाए उसे अजब हैरानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
     खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

          रानी बढ़ी कालपी आईए कर सौ मील निरंतर पारए
                घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार
    यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार
                     विजयी रानी आगे चल दीए किया ग्वालियर पर अधिकार।
अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
    खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

             विजय मिलीए पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी
                  अबके जनरल स्मिथ सम्मुख थाए उसने मुहँ की खाई थी
  काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।
           पर पीछे ह्यूरोज़ आ गयाए हाय! घिरी अब रानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
    खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

          तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार
                किन्तु सामने नाला आयाए था वह संकट विषम अपार
         घोड़ा अड़ाए नया घोड़ा थाए इतने में आ गये अवार
     रानी एकए शत्रु बहुतेरेए होने लगे वार.पर.वार।
       घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
     खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

          रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी
             मिला तेज से तेजए तेज की वह सच्ची अधिकारी थी
              अभी उम्र कुल तेइस की थीए मनुज नहीं अवतारी थी
          हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता.नारी थी
                दिखा गई पथए सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
     खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी
      यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी
     होवे चुप इतिहासए लगे सच्चाई को चाहे फाँसी
         हो मदमाती विजयए मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।
           तेरा स्मारक तू ही होगीए तू खुद अमिट निशानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
    खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 
                                                                                      सुभद्रा कुमारी चौहान
 

झाँसी की रानी

रानी को बानौ मर्दानों वीर वानौ हेर।
गोरे सिपइयन की आँखें चकुचौधियात।।
जौने कछू समझें ये चपला चमकी कहाँ।
तारे सी टूटी लये दोनों तलवार हाथ।।
छपक छपाके तलवारन की खच्च खन्न।
रूण्डन से मुण्ड सब नीचे गिरत जात।।
रानी दोउ हाथन से फसल सी काटरयी।
होवे मैदान जिस ओर बढ़ तुरंग जात।।
होवे कोई सुरमा लड़ाका कितना मगर।
दहरे ना सामने चुटकी में मरत जात।।
जीते कलकत्ता पटना मद्रास सब।
बड़ी आसानी से आगे बढ़त जात।।
जाने रानी ने कैसो पानी झाँसी को पियो।
बड़े बड़े हार गये चली ना किसी की विसात।।
अरि से न हारों स्वीकारो ना दासता।
दुश्मन की चालों का करार जबाव दो।।
मातृभूति रक्षा में सब कुछ लुटाना पडे़।
हंसी है सी सारा कुछ दावं पर लगाय दो।।