दरवाजा खोलो सफलता खटखटा रही है

सन् 1962 में विश्व के सर्वोत्तम विश्वविद्यालयों से अमेरिका से व्यापार प्रबंधन की शिक्षा लेकर लौटा था।
    बैद्यनाथ तेजी पकड़ रहा था-पिताजी का इस ओर ध्यान देने का समय नहीं था आ0 भाई जी भी आयुर्वेद पढ़े थे निर्माण से ही फुर्सत नहीं थी।
    मैंने जिम्मा लिया कार्यालय (कागजत सम्बन्धी व्यवस्था सुधार का। बाबूलाल योगी स्टोर कीपर के पास निर्माण रजिस्टर था- लगभग 1200 पृष्ठ का महा गृन्थ जबकि बिक्री केवल लाखों मंे थी। सुधार के बाद रजिस्टर की पृष्ठ संख्या रह गई 200 से कम और हर सूचना तत्काल उपलब्ध। सौभाग्य पिताजी ने महा महोपाध्याय प्रभुदत्त जी के सुपुत्र बड़ी बहन सुभद्रा के पति पं0 कैलाश   चन्द्र जी को बुला लिया- वे पंजाब में गुरूदासपुर में डिग्री कालेज संस्कृत के प्रोफेसर थे।
    हम दोनों का काम था व्यवस्था सुधार का। मैं अमेरिका का नवीतम जानकारी के साथ और वे संस्कृत के प्रोफेसर। मैं आश्चर्यचकित था उनकी व्यापार प्रबंधन की जानकारी पर। मेरे तौर पर पूछने पर बोले ‘‘सामान्य तर्क है कोई विशेष बुद्धिमानी नहीं’’ हमने दर्शन, सांख्य के साथ तर्क भी पढ़ा है-पढ़ाया है।
    ये है संस्कृत ज्ञान की उपयोगिता। ब्राह्मण का पहला कर्तव्य था ज्ञान प्राप्ति और उसका समाज में वितरण। राजा पुत्र को महर्षि वशिष्ठ जैसे गुरू राज पाट नियम-क्षत्री पुत्र को (द्रोणाचार्य) शस्त्र विद्या में पारंगत-वणिक पुत्र को व्यापार (आचार्य चाणक्य आदि) और शूद्र (सेवक को उसका कर्तव्य ज्ञान और उसके लाभ। और ब्राह्मण को बाहय कर्म-शिक्षा-वैद्यक, कर्मकाण्ड आदि 
यस्य संसार  सारिणी  प्रज्ञा  धर्मार्थ नुतते
     कामादर्थ  वृणते  यः  स  व  पण्डित उच्चते।
    अर्थ-जिसके जीने के कारण अन्य बहुत से प्राणी जीवन पाते हैं, वही मनुष्य जीवित माना जाता है। अन्यथा कौआ भी अपनी चोंच से ही अपना पेट भर लेता है। जो अपने लिए जीता है, उसका जीवन भी कोई जीवन है।
    ब्राह्मण वैद्य थे- बीमार पड़ने का प्रश्न ही नहीं-तत्काल उपचार वाले, सामान्य दक्षिणा, जीवन यापन को पर्याप्त। ब्राह्मण कर्मकाण्डी का पहला कर्तव्य स्वच्छता-गौमूत्र और गोबर (गाय की टट्टी और पेशाव) जी हां और सर्वाधिक आवश्यक क्रिया लिये भोजन आसन पर क्रियाकर्म हेतु भी। - राजा प्रजा का आदर भी स्वस्थ रहने का सबसे बड़ा टानिक है।
    बताईये ब्राह्मणों की आबादी कम होगी या बढेगी। पर धन्य है प्रजातन्त्र-सर्वाधिक आबादी वाले- का शासन में न्यूनतम हिस्सा सबसे योग्य समुदाय-भूखा भटक रहा है। बुन्देलखण्ड के हर जिले में 18 से 22ः ब्राह्मण हैं।
                        गलती प्रजातन्त्र की नहीं है- प्रजातन्त्र है
संघे शक्ति कलियुगे। डाक्टर-वकील-शिक्षक-हरिजन-लोधी-यादव, कुर्मी-जाट-गुजर सभी के समुदाय संगठित हैं और संख्या के आधार पर पूरे समाज की शक्ति को उपयोग कर रहे है- शासन कर रहे हैं- अपनी श्री वृद्धि कर रहे हैं। और ब्राह्मण- दाता ब्राह्मण सर्व समाज सम्मानित ...(......दशरथ .........सादीपनी- क्या कहा जाय)
अंग्रेजी में कहावत है पारसीमोनियस अर्थ है ईमानदारी की पराकाष्ठा। यवन आताताईयों से दुखित सूर्य पूजक जब परसिया (आज का ईरान से भागे और गुजरात आये थे। राजा के दरबार में शरण लेने पहुंचे तो मंत्री ने उन्हें पानी भरा ग्लास दिखाया कि गिलास भरा है जगह नहीं है (और आबादी की) -
आगन्तुको के नेता ने थोड़ी चिनी मंगाई और घोल दी-अर्थ था हम इतने घुलमिल जायेगे कि पता भी नहीं चलेगा- हम समाज मंे सद्भाव-मीठापन बढ़ा देगे। एैसा ही हुआ।
पर एक भयंकर गलती वे कर गये-केवल आपस मंे ही-परम्परागत संस्कार-भाषा- इतिहास के कारण विवाह किया। आज भारत में पारसी समुदाय समाप्त होने पर है। टाटा, भाभा- सेन्ट्रल बैंक आदि बड़ी बड़ी संस्थाये इनकी देन है पर एक सामान्य गलती से लुप्त होने के कगार पर है।
ब्राह्मण यही कर रहा है क्या ! बहन मायावती कहती रही हैं लुटिया-खटिया-बिटिया-पहले लुटिया (कुए से पानी का अधिकार) फिर खटिया (साथ बैठने का अधिकार) और अब बिटिया भी दे रहे हैं। मैंने कई बड़े अधिकारी देखे है जिनकी पत्नियां हरिजन नहीं हैं। पर उनका पुत्र क्या अभी भी वही आरक्षण पाने का अधिकारी है।
हरिजन पिछड़ी  जाति-अति पिछड़ी-आरक्षण फिर प्रमोशन  में भी आरक्षण ( मिलाकर 50 से अधिक) हो गये हैं।
जातियों में भी अपने स्वजातीय कर्मकाण्डी होने लगे हैं।
    यस्य.....
जब बुन्देलखण्ड पर नजर डाले-झांसी ललितपुर ही सही-। सबसे पहला कालेज रानी मुखर्जी (फिल्मकार) के पडदादा ने मैक डानल्ड हाई स्कूल जिसे विपिन विहारी बनर्जी-फिर प्रफुल्ल कुमार चटर्जी ने बुलंदियों तब पहुंचाया। आर्यकन्या प्रारम्भ हुआ 100 वर्ष पूर्व पं0 बाबूलाल जी शर्मा की पत्नी द्वारा 5 कन्याओं के साथ- पं0 कृष्ण चंद शर्मा कन्या विद्यालय-तिवारी कन्या महाविद्यालय, बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय (पं0 हेमवती नन्द बहुगुणा)-पं0 रामसहाय शर्मा द्वारा आत्माराम गोविन्द खेर गुरसराय (शर्मा जी तो वृद्धावस्था मंे समय विद्यालय के कुए पर बैठकर बच्चों को पानी पिलाने लगे थे। पं0 सुदामा प्रसाद गोस्वामी झोला छापा पास में 10 रूपये नहीं बंड़ी बनियान व जांधियें में सुशोभित विद्यालय खोले जिसने बाप की नहीं राजा मर्दन सिंह की स्मृति में कालेज खोले। डा0 रिछारिया के भाई रमेश (मेरे सहपाठी) द्वारा बरूवासागर डिग्री कालेज-बुन्देलखण्ड के तथा कथित भामाशाहों से ऊपर पं0 रामनारायण वैद्य-बी0के0डी0-पुत्र बृजेन्द्र कुमार ने गूंगे बहरों का स्कूल- विश्वनाथ रानी लक्ष्मीबाई पब्लिक स्कूल आदि- पं0 रमेश शर्मा ने आर0एन0एस0 (रामनारायण शर्मा) विद्यालय, पं0 शिवनाथ शर्मा मुझसे छोटा) संस्कृत कालेज दतिया में 30 कमरों का विशाल भवन।
आज अखबार में पढ़ा बी.जे.पी. ने राजपूतों पर दाव फेका। यादव वाद- हरिजन वाद- जाट वाद (चैधरी अजीत सिंह), गुर्जर वाद ............ कुर्मी वाद- पटेल परिवार- ठाकुर वाद विश्वनाथ प्रताप- चन्द्रशेखर .......... अब उमा बहन जी का लोधी वाद
                अयः निजः परोवे... गणना लघु चेत साम
                उदार चरिता नाम तु वसुदैव कुटुम्बकम
कौन किस पार्टी में है। किससे सपोर्टड है- होगा। ब्राह्मण है। बस इतना बहुत है।
    मेरा तेरा सोचने वाले की बुद्धि छोटी होती है। जिझोतिया, कानकुब्ज, गौड़, मैथिल, सनाड्य, मराठी-तैलग-आंध्रा तमिल-केरल-उडि़या-बंगाली-पंजाबी-सारस्वत सभी ब्राह्मण है आपके सपोर्ट के अधिकारी और अपने सेवक।