देश के लाल - शास्त्री जी: मेरे संस्मरण

1964-65-66 में मैं बैद्यनाथ के हैड कार्यालय का इंचार्ज डायरेक्टर था। खबर लगी कि भारत पाकिस्तान युद्ध के बाद शान्ति वार्ता हेतु पूज्य शास्त्री जी रूस के शहर ताशकन्द गये थे। 11 जनवरी 66 में अचानक मृत्यु हो गई। शव दिल्ली लाया जा रहा है। कलकत्ता-दिल्ली हवाई जहाज की उड़ाने केवल 2-3 थी इसलिए जगह नहीं मिली। पता लगा कि विशेष विमान की व्यवस्था की जा रही है। प्रयास करने पर मुझे उसमें स्थान मिल गया। संयोग से उसी जहाज में  संघ प्रमुख पूज्य गुरू गोलवलकर भी थे। मैंने उनसे प्रणाम किया अपना परिचय वैद्य रामनारायण जी के द्वितीय पुत्र के रूप में दिया तो उन्होंने आर्शीवाद दिया। इसके बाद जब उन्होंने पूरे परिवार छोटे छोटे सुरेश, रमेश भाइयों के लिए भी नाम लेकर पूछा तो मैं स्तम्भित होकर रह गया कि क्या ये सम्भव है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जैसे विशाल संस्थान के प्रमुख को, थोड़ी बहुत निकटता वाले परिवार की इतनी जानकारी हो। रूचि कैसे सम्भव है। उनसे सैकड़ो मंत्री, प्रधान मंत्री, राजे महाराजे, विदेशी गणमान्य व्यक्ति मिलते थे। खैर! हमारी थोड़ी चर्चा (फ्लाइट घण्टे की थी) शास्त्री जी के सादेपन-दृढ निश्चयी स्वभाव आदि पर भी हुई थी।
    दिल्ली आकर में मध्य प्रदेश के राजकीय अतिथिगष्ह में ठहरा। पूरे देश के सभी प्रान्तों के मुख्य मंत्री, मंत्रीगण, गवर्नर आदि से दिल्ली भरी पड़ी थी।
    ............ शास्त्री जी की शवयात्रा में शामिल होने का अवसर मिला। परिवार से परिचित होने के नाते दाह होने के बाद भी रूका रहा। जैसी आम चर्चा उन दिनों थी मुझे  भी वह सत्य लगी कि शास्त्री जी स्वाभाविक मृत्यु को प्राप्त नहीं हुए। उनकी हत्या हुई थी। 15-20 फीट की दूरी से देखते ही पता चल गया कि हमेशा चमकने वाला चेहरा काला सा (निश्चित सांवला) दिख रहा था और गरदन पर भी कालोच ज्यादा थी। 
    विडम्बना देखिए कि उनकी मृत्यु के लगभग कुछ सप्ताह पूर्व व्यायामशाला के कुछ कार्यकत्र्ता उनके निवास पर दिल्ली में मिले थे। हमें एपाइन्टमेंट में कोई दिक्कत नहीं। मात्र कह दिया कि झांसी व्यायामशाला से आये हैं अन्नाजी ने भेजा है। इतना पर्याप्त। फौरन सूचना आई भेज दो। अपनी आदत के अनुसार शास्त्री जी लान में टहल रहे थे। हमें भी साथ ले लिया। पूछा अन्नाजी कैसे हैं संस्था कैसी चल रही है आदि। मैंने कहा कि आ0 अन्नाजी ने कहा है कि अब तो आप प्रधान मंत्री हैं। संस्था की सहायता में कोई कठिनाई नहीं होगी। मूर्खतावश मैंने इतना और जोड़ दिया कि राजनीति है पता नहीं कब क्या हो जाय तो हंसकर बोले अभी बस ठीक है-चिन्ता मत करो कोई विपत्ति नहीं आने वाली। मैं ताशकंद जा रहा हूँ-शीघ्र लौटकर झांसी आकर आप सब से मिलूंगा।
    होनी को कुछ और ही मंजूर था हमारा दुर्भाग्य कि शास्त्री जी जैसे देश रत्न को हमने खो दिया। देश की हानि के सामने व्यायामशाला कोई मायने नहीं रखती पर अभी तक विश्वास है कि शास्त्री जी झांसी आते तो संस्था का बड़ा हित होता।