न्यास की उपलब्धियाँ

पं0 विश्वनाथ शर्मा हिन्दू धर्मार्थ न्यास द्वारा क्रियान्वित किये जा रहे कार्य:- 
 
  •  न्यास द्वारा सन् 1982 में रानी लक्ष्मीबाई पब्लिक स्कूल समूह शिक्षण संस्था की स्थापना व झाँसी, ललितपुर (उ0प्र0) व दतिया (म0प्र0) में संचालन।
  •  न्यास द्वारा शिक्षा प्रोत्साहन हेतु झाँसी, ललितपुर, उरई, महोबा, हमीरपुर (उ0प्र0), सागर, शिवपुरी, टीकमगढ़, दतिया, छतरपुर (उ0प्र0), नैनीताल (उत्तराखण्ड) में 238 विद्यालयों के 14000 विद्यार्थियों को (इक्सठ लाख रूपये प्रोत्साहन राशि, स्मृति चिन्ह, प्रशस्ति-पत्र व न्यास द्वारा मुद्रित हमारे पूर्वज व हमारे प्रेरक पुस्तक से सम्मानित)
  •  न्यास द्वारा झाँसी, ललितपुर, हमीरपुर, महोबा, बांदा (उ0प्र0), दतिया (म0प्र0) के 950 विद्यालयों में अभ्यास पुस्तिकाओं का वितरण।
  •  न्यास द्वारा झाँसी, ललितपुर, महोबा (उ0प्र0) के नगर व ग्रामीण क्षेत्रों के 30 विद्यालयों में 105 कम्प्यूटर प्रदान।
  •  न्यास द्वारा ब्राह्मण छात्रों को आर्थिक सहायता प्रदान।
  •  न्यास द्वारा 24 संस्कृत विद्यालयों को आर्थिक सहायता।
  •  न्यास द्वारा झाँसी, बानपुर, तालबेहट, कटेरा पूराकला, सतरबांस, सतवांसा (ललितपुर जनपद) में विद्यालय निर्माण हेतु सहायता। 
  •  न्यास द्वारा खेल के क्षेत्र में क्रिकेट, हाॅकी, जिमनास्टिक अकादमियों का संचालन व जनपद झांसी, ललितपुर, महोबा, बांदा (उ0प्र0), टीकमगढ़ दतिया (म0प्र0) के 90 विद्यालयों में खेल सामग्री (डम्बल, मुगदर) वितरित।
  •  न्यास द्वारा निःशुल्क चिकित्सा शिविरों का आयोजन व रोगियों को निःशुल्क दवाओं का वितरण। 
  •  न्यास द्वारा पेयजल योजना के अन्तर्गत झाँसी, ललितपुर जनपदों में 32 हैण्डपम्पों का स्थापन व क्षेत्र में टैंकरों द्वारा जल वितरण।
  •  न्यास द्वारा विभिन्न समाजों के सामूहिक विवाहों में आर्थिक सहायता।
  •  न्यास द्वारा सांस्कृतिक विकास हेतु झाँसी, ललितपुर जनपद की राम लीला समितियों को आर्थिक प्रोत्साहन।
  •  न्यास द्वारा झाँसी, दिगारा, बरूआसागर, महोबा, तालबेहट (उ0प्र0), दतिया, ओरछा (म0प्र0) में गौशालों को आर्थिक सहायता।
  •  न्यास द्वारा प्राकृतिक आपदा झांकरी, सेमरी (झांसी), मड़ावरा (ललितपुर) कश्मीर, लातूर (महाराष्ट्र), कोसी (बिहार), उत्तराखण्ड में आर्थिक सहायता। 
  •  न्यास द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में समय-समय पर निसहाय एवं गरीब परिवारों को कम्बल, साड़ी कपड़े, अन्नादि वितरण।

 

मेधावी छात्र प्रोत्साहन योजना के अन्र्तगत मेधावी छात्र/छात्रा को न्यास के स्मृति चिन्ह, प्रशस्ति पत्र, न्यास द्वारा मुद्रित हमारे पूर्वज एवं हमारे प्रेरक पुस्तक, व नगद राशि से पुरूस्कृत किये जाते है।


 

SUMMARY FINANCIAL ASSISTANCE DISTRIBUTED
FROM 1994 TILL DATE
SCHOLARSHIP TO STUDENTS OF OTHER SCHOOLS
 
Financial Year No. of Students Total Amount Details 
1994-1995 94 47,250.00 View Details
1995-1996 335 1,50,300.00 View Details
1996-1997 43 32,900.00 View Details
1997-98 & 1998-99 449 2,20,800.00 View Details
1999-2000 54 15,750.00 View Details
2000-2001 79 43,250.00 View Details
2002-2003 232 4,41,740.00 View Details
2003-2004 653 4,11,084.00 View Details
2004-2005 110 1,09,000.00 View Details
2005-2006 273 1,59,500.00 View Details
2006-2007 1736 7,32,600.00 View Details
2007-2008 1166 3,54,000.00 View Details
2008-2009 1942 5,48,900.00 View Details
2009-2010 2776 7,29,350.00 View Details
2010-2011 483 1,73,600.00 View Details
2011-2012 1646 578350.00 View Details
2012-2013 787 3,26,900.00 View Details
Grand Total 12873 56,50,774.00  
 
 
 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


पं0 विश्वनाथ शर्मा हिन्दू धर्मार्थ न्यास, झाँसी द्वारा

वर्ष 1994 से अब तक ब्राह्मण छात्रों को वितरित की गई प्रोत्साहन राशि
 
वित्तीय वर्ष छात्रों की संख्या कुल राशि
1994 - 1995 39 19,500.00
1995 - 1996 268 1,17,300.00
1996 - 1997 41 31,700.00
1997 - 98 & 99 449 2,20,800.00
1999 - 2000 19 5,000.00
2001 - 2002 71 38,250.00
2002 - 2003 122 2,31,900.00
2003 - 2004 463 2,36,994
2004 - 2005 92 92,500.00
2005 - 2006 236 1,26,500
2006 - 2007 700 3,00,500.00
2007 - 2008 592 1,73,750.00
2008 - 2009 485 1,33,950.00
2009 - 2010 678 1,83,700.00
2010 - 2011 92 35,600.00
2011 - 2012 305 1,45,700.00
2012 - 2013 22 6,500.00
2013 - 2014 128 1,03,500.00
महायोग योग 4883 22,03,644.00

 

  1. पंविश्वनाथ शर्मा हिन्दू धर्मार्थ न्यास द्वारा संचालित झांसी नगर निःशुल्क सिलाई केन्द्रों की  संचालिकाओं की सूची

  2. पंविश्वनाथ शर्मा हिन्दू धर्मार्थ न्यास द्वारा संचालित ललितपुर नगर के निःशुल्क सिलाई केन्द्रों की संचालिकाओं की सूची

  3. पंविश्वनाथ शर्मा हिन्दू धर्मार्थ न्यास द्वारा उच्च शिक्षा हेतु ब्राह्मण छात्रों को आर्थिक सहायता।

  4. पंविश्वनाथ शर्मा हिन्दू धर्मार्थ न्यास द्वारा न्यास द्वारा स्थापय हैण्डपम्पों की सूची

  5. पंविश्वनाथ शर्मा हिन्दू धर्मार्थ न्यास द्वारा आयोजित निःशुल्क आयुर्वेद स्वास्थ्य शिविरों की सूची

  6. पंविश्वनाथ शर्मा हिन्दू धर्मार्थ न्यास द्वारा संस्कृत विद्यालय/छात्रों को प्रदत्त छात्रवृत्तियां

  7. पंविश्वनाथ शर्मा हिन्दू धर्मार्थ न्यास द्वारा सामूहिक विवाह कार्यक्रम हेतु आर्थिक सहायता।

  8. पंविश्वनाथ शर्मा हिन्दू धर्मार्थ न्यास द्वारा ब्राह्मण संस्थाओं  विद्यार्थियों को आर्थिक सहायता की सूची

  9. पं0 विश्वनाथ शर्मा हिन्दू धर्मार्थ न्यास द्वारा  वितरित डम्बल व मुगदर का विवरण

  10. पं. विश्वनाथ शर्मा हिन्दू धर्मार्थ न्यास द्वारा रामलीला समितियों को दिया गया दान

  11. पं. विश्वनाथ शर्मा हिन्दू धर्मार्थ न्यास द्वारा गौशालाओं को आर्थिक सहायता।

  12. पं0 विश्वनाथ शर्मा हिन्दू धर्मार्थ न्यास द्वारा वितरित कम्प्यूटरों की सूची

  13. पं. विश्वनाथ शर्मा हिन्दू धर्मार्थ न्यास द्वारा झाँसी जनपद मुद्रित अभ्यास पुस्तिका वितरण का विवरण

  14. पं0 विश्वनाथ शर्मा हिन्दू धर्मार्थ न्यास द्वारा मेधावी छात्र प्रोत्साहन राशि (नगद राशि, स्मृति चिन्ह, हमारे प्रेरक, हमारे पूर्वज व प्रशस्ति पत्र)

  15. पं0 विश्वनाथ शर्मा हिन्दू धर्मार्थ न्यास द्वारा 1982 से रानी लक्ष्मीबाई पब्लिक स्कूल समूह शिक्षण संस्थाओं की स्थापना व संचालन 

  16. पं0 विश्वनाथ शर्मा हिन्दू धर्मार्थ न्यास द्वारा तीन विशाल खेल परिसरों का संचालन।

  17. पं0 विश्वनाथ शर्मा हिन्दू धर्मार्थ न्यास द्वारा ब्राह्मण व अन्य संस्थाओं को आर्थिक सहायता।

  18. पं0 विश्वनाथ शर्मा हिन्दू धर्मार्थ न्यास द्वारा विद्यालयों के निर्माण में सहायता।

  19. पं0 विश्वनाथ शर्मा हिन्दू धर्मार्थ न्यास द्वारा प्राकृतिक आपदा में सहायता।

  20. गरीब असहाय लोगों में लाखों रूपये के कम्बल व सहारिया आदिवासी जनजाति के लोगों में साडि़यां व कपड़े वितरण, बच्चों में कपड़े, जूते, गल्ला, भोजन थैले।


दैनिक मध्यदेश

(स्थापना सन 1966 - भोपाल)
देश का आठ पृष्ठ का प्रथम हिन्दी दैनिक 
5 विशेषांक केवल बुन्देलखण्ड पर
1970-71-72 में पुस्तकवार प्रकाशित

गणतन्त्र-दिवस

वर्ष : 5                                                                                           प्रधान सम्पादक:                                                             26 जनवरी, 1971
अंक: 335                                                                                      डा.पं.विश्वनाथ शर्मा                                                                                                                                                                            
 
सम्पादकीय,
दैनिक मध्यदेश का यह गणतन्त्र दिवस विशेषांक पुण्य भूमि बुन्देलखंड को समर्पित है। अपने दीपावली विशेषांक में हमने बुन्देलखण्ड के पुरातत्व, कला, साहित्य, भाषा, इतिहास, आर्थिक विकास आदि विभिन्न विषयों पर बानगी के रूप में थोड़ी-थोड़ी सामग्री प्रस्तुत की थी। बुन्देलखण्ड को समर्पित हमारे विशेषांक की माला का यह दूसरा पुष्प है। इसमें अधिकांश सामग्री बुन्देलखण्ड के इतिहास और साहित्य पर है। इसे पढ़कर पाठक बुन्देलखण्ड के शौर्यमय इतिहास का कुछ अनुमान लगा सकेंगे। निश्चय ही बुन्देलखण्ड का इतिहास जितना प्रेरक और रोमांचकारी है उतना विश्व में किसी अन्य क्षेत्र का नहीं। इसके मनन की आवश्यकता है। आज बुन्देलखण्ड वासी अपने गौरव, पराक्रम और उत्कर्ष को उसी प्रकार भूल चुके हैं, जैसे सीता माता की खोज में जाने के पूर्व वीर हनुमान अपने पराक्रम को विस्मृत कर चुके थे। यह विशेषांक पुन: उस स्मृति को ताजा करना चाहता है जिससे इस उपेक्षित क्षेत्र के वासी अपने अतीत के गौरव के अनुरूप अपना वर्तमान और भविष्य बनाने के लिए संगठित रूप से प्रयत्नशील हों। साहित्य की दृषिट से भी बुन्देलखण्ड बड़ा सौभाग्यशाली रहा है। यहां पुराणों से लेकर बुन्देली और खड़ी बोली के अनेक आधुनिक ग्रन्थों तक असंख्य सुन्दर ग्रन्थ रचे गये हैं। विभिन्न युगों में संस्कृत और हिन्दी के अनेक श्रेष्ठ कवियों और लेखकों ने यहाँ जन्म लेकर बुन्देलखण्ड के गौरव को बढ़ाया है।
यह सन्तोष की बात है कि साहित्य-साधना का कार्य यहाँ आज भी अबाध गति से चल रहा है। एक छोटे से विशेषांक में बुन्देलखण्ड के दीर्घ इतिहास की सब घटनाओं का तथा महापुरूषों का समावेश करना उसी प्रकार असम्भव है जिस प्रकार यहां के सब लेखकों और कवियों का उसमें परिचय देना! स्थानाभाव के कारण अनेक महापुरूषों, श्रेष्ठ लेखकों और कवियों का इस विशेषांक में समावेश नहीं हो सका। इसका अर्थ यह नहीं कि वे किसी प्रकार कम श्रेष्ठ थे या हैं। ऐसे बस महापुरूषों, लेखकों और कवियों को श्रेष्ठ मानते हुए हम उनके प्रति क्षमा प्रार्थी हैं। गणतंत्र दिवस पर प्रकाशित इस विशेषांक में गणतन्त्र दिवस के महत्व पर विशेष सामग्री नहीं मिलेगी। बुन्देलखण्ड वासियों के लिए आज की परिसिथति में यह अस्वाभाविक नहीं। इक्कीस वर्ष पूर्व गणतंत्र दिवस पर हमें स्वराज्य तो मिला परन्तु सुराज्य नहीं।
बुन्देलखण्ड वासियों ने इस दिवस के पूर्व जो स्वप्न सँजोये थे वे चकनाचूर हो चुके हैं। हमारी सब आकाँक्षायें, आशायें, निराशा में परिणित हो चुकी हैं। इसलिए इस दिवस के आगमन पर उपेक्षित बुन्देलखण्ड वासी उल्लास और उत्साह का अनुभव कैसे करें ? यदि दैनिक मध्यदेश का यह विशेषांक पाठकों में बुन्देलखण्ड के महान इतिहास और साहित्य के प्रति आदर का भाव उत्पन्न कर सका तथा बुन्देलखण्ड वासियों को उनके गत पराक्रम और शौर्य का साक्षात्कार कराकर उन्हें संगठित होकर अपनी समस्यायें सुलझाने की प्रेरणा दे सका तो हम अपना यह प्रयास सफल समझेंगे।
 
- प्रधान सम्पादक

सिद्धेश्वर: एक महान संस्था का निर्माण

सिद्धेश्वर पीठ ग्वालियर रोड से मेरा परिचय सन् 1953 में हुआ था जब पं. विश्वनाथ शर्मा जी ने  इण्टर में राजकीय विद्यालय में प्रवेष लिया। शिव मंदिर तो बना हुआ था पर थोड़ा सा काम हर महीने हुआ करता था। बाद में पता चला कि आदरणीय धुलेकर जी का विश्वास था कि पुख नक्षत्र में कार्य होने से आयु बढ़ती है। वे जिए भी 90 से ऊपर। चूँकि  इसी रोड पर बैद्यनाथ कारखाना - मेरे अन्य फार्म हैं इसलिए रोज 4 - 6 बार निकलना होता था। 70 के दशक में थोड़ा काम होना भी मंदिर में नही दिखता था। धीरे-धीरे पत्थर से बने मंदिर के बाई ओर के 2 - 3 कमरे भी खण्डहर बन गये। अस्सी के दशक के उत्तरार्ध में मैंने देखा मंदिर प्रांगण में सफाई होने लगी है और थोड़ी बहुत पूजा अर्चना भी। एक युवक भी अकसर दृष्टिगोचर हुआपरिचित चेहरा होने पर यह भी बताया कि संस्कृत गुरु श्री झाँ के साथ, जिन्हें पिताजी ने बिहार मिथिला से बुलाकर संस्कृत विद्यालय प्रारम्भ कराया था, हमारे निवास भी आता था - नाम हरि ओम पाठक बताया। मैंने उत्साहवर्धन किया।  कुछ समय बाद मैंने अन्न की व्यवस्था भी  करा दी। क्रम चलता रहा - खण्डहर होते कमरे ठीक हो गये। थोड़े से वृक्ष व पुष्प पौधे भी लग गये आदि आदि। सन् 1991 में पाठक जी ने मुझसे कहा कि वे लक्षचण्डी यज्ञ करना चाहते हैं तो मैंने हंसकर कहा कि शतचण्डी यज्ञ व भण्डारे में ही 25 - 30 हजार खर्च होते हैं - लक्षचण्डी तो सामथ्र्य से बाहर है और इसमें विधि विधान भी बहुत होते हैं। यज्ञ अति श्रम साध्य - द्रव्य साध्य व साधन साध्य है। न करें ।
इसके कुछ ही दिनों बाद जब मैं फिर सिद्धेश्वर पीठ रूका तो पाठकजी ने सूचित किया कि उन्होंने स्वयं यजमान की दीक्षा लेकर यज्ञ प्रारम्भ कर दिया हैं - अर्थात सम्पुष्ट के साथ मंत्रों का जाप प्रारम्भ कर दिया है। तब मैंने कहा कि कोई बात नहीं शुभ संकल्प निष्फल नहीं जाते। इसके बाद मैंने नियमित रूप से अन्न एवं कुछ आर्थिक भेंट भी देना प्रारम्भ कर दिया।  सन् 1994 के प्रारम्भ में पाठक जी ने बताया कि भण्डारे के लिए अन्न एकत्रित करना है उन्होंने समय-समय पर जीप की व्यवस्था की और मैंने डीजल की - फिर अपनी गाड़ी भी दे देता था। मैंने जोंगा, सांसद के नाते सरकार से ली। नयी मरसडीज का इंजन दिल्ली में ही फिट कराकर पाठक जी को दे दी और डीजल की व्यवस्था भी कर दी। फिर पाठक जी के आग्रह पर मैंने यज्ञ समारोह का अध्यक्ष बनना स्वीकार कर लिया  तथा पर्चो - बैनरों - लैटर पैड पर मेरा नाम अध्यक्ष के रूप में प्रयोग हुआ। इस पर लोगों को समारोह की सफलता निश्चित लगी। पाठक जी की मेहनत भी रंग लाई। नवम्बर 1995 में तीन वर्ष के जप और तपस्या के बाद पूर्णाहुति होनी थी। पाठक जी ने बुन्देलखण्ड के गाँव-गाँव से देवस्थान की मिट्टी व पवित्र जल मंगाया था जिसका पूजन बद्री आश्रम एवं द्वारिका पीठाधीश्वर जगत्गुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द जी ने किया था। इसके अतिरिक्त उज्जैन - वृन्दावन - हरिद्वार से भी प्रमुख संत आये थे। बुन्देलखण्ड के सभी जिलों से प्रमुख साधु संत आमंत्रित थे और आये भी। सभी को उचित भेंट दी गई। मेरा व भाईयों व बैद्यनाथ परिवार द्वारा 4 - 5 लाख रूपये की व्यवस्था की गई थी जिसमें सामग्री, बर्तन आदि भी थे।
 
बड़े ठाकुर जी की रासलीला भी वृन्दावन से आई और अत्यन्त सुन्दर रासलीला हुई। जिन्हें अंतिम दिन तो मैंने स्वयं रू0 21,000 की विषेष भेंट दी थी। पूरे कार्यक्रम में कर्नल डंगवाल, सचिव पं0 विश्वनाथ शर्मा हिन्दू धर्मार्थ न्यास का प्रशासन आदि लगे रहे। 
यज्ञ की पूर्णाहुति 8 नवम्बर को हुई। अठारह पुराणों व चारों वेद संहिताओं का पाठ भी हुआ। उ0 प्र0 के राज्यपाल महामहिम श्री मोतीलाल बोरा भी पधारे। भण्डारा भी दिनभर चला और प्रसाद तो एक सप्ताह तक सभी विद्यालयों एवं सभी बसों व कई शहरों में बांटा गया। सभी पण्डितों एवं साधुओं को यथोचित भेंट दी गई।
इससे भी बड़ी बात यह हुई कि इतने भक्तों की भागीदारी से स्थान सिद्ध हो गया और तब से तो कम से कम 2 करोड़ रूपये का निर्माण स्थान पर भक्तों द्वारा किया गया है जैसे शनि मंदिर, देवी मंदिर सांई बाबा मन्दिर धर्मशाला - गौशाला सम्मेलन हाल आदि । सिद्धेश्वर आज बुन्देलखण्ड का प्रमुख तीर्थ स्थल बन गया है। 
 
                                                                                                                                                  -डाॅ0 पं0 विश्वनाथ शर्मा
                                                                                                                                                             पूर्व सांसद

 

स्वर्ग आश्रम बरूआसागर का इतिहास

1940 के दशक में स्वर्ग आश्रम पर जहां कुण्ड बना है अविरल जलधारा का प्रवाह रहा है उसी के किनारे पेड़ से सटी हुयी मां दुर्गा और अन्नपूर्णा जी की दो मूर्तिया थी । इसी कुन्ड की पूर्व की ओर पहाड़ी पर एक प्राचीन मंदिर बना है जिसमें लक्ष्मण जी एवं माता उर्मिला जी की मूर्तिया विराजमान थी यह मंदिर 1930 से पूर्व लखेश्वर महाराज (जो  मऊरानीपुर के पास है) के अधिपत्य में था उन्ही के वंशज श्रीमती रामप्यारी दुबे एवं उनके दो पुत्र रामचरण दास एवं रामसेवक दास लक्ष्मण शाला की देख रेख करते थे कृषि भूमि विवाद के चलते 1955 में निर्जला एकादशी के दिन सनौरा बरूआसागर निवासी विजय दुबे  सन् 1949 में सदर बाजार शिव मंदिर पर रहने वाले संत स्वर्ग आश्रम बरूआसागर पर जड़ी बूटी की खोज में आये एवं जड़ी बूटियां इक्ठ्ठी कराने लगे 1956 तक यह क्रम चला इसी बीच वैद्य के रूप में उन्हे ख्याति मिल गयी और वे शरणानन्द के नाम से विख्यात हो गये। नगर वासियों का आग्रह स्वीकार कर झरना पर रूक गये  कुण्ड का निर्माण कराया, भजन कीर्तन कराया 1962 को नगर वासियों के एक दल के साथ तीनों धाम की यात्रा पर निकल गये 
 
इसी बीच 1975 में स्वामी जी पुनः आश्रम पर पहुंचे रात में सीताराम यादव एवं जय प्रकाश सरार्फ रखवाली करने लगे कीर्तन शुरू हो गया। कुम्भ से वापस आने पर 16 माह का अखण्ड कीर्तन, गायत्री जाप, अखण्ड रामायण एवं भण्डारा हुआ। पूज्य स्वामी शरणानन्दजी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर लक्ष्मण शाला गद्दी के वारिस एवं पुजारी बाबा रामसेवक दास ने शराव छोड़ दी बाबा राम सेवक दास अविवाहित थे उनका कोई शिष्य नही था उनकी मां का देहान्त 1960 में हो गया था। 1978 को वैधानिक दान पत्र के माध्यम से बाबा राम सेवक दास ने अपनी सम्पूर्ण चल अचल सम्पत्ति स्वामी शरणानन्द सरस्वती शिष्य स्वामी शारदानन्द सरस्वती को अर्पण कर दी थी। 1970 में नोटघाट, धुधुवां, फुटेरा, बंगरा एवं बिहारीपुरा जिला-टीकमगढ़ थाना निवाड़ी के ग्रामों में पूज्य स्वामीजी को भूमिदान स्वरूप प्राप्त हुयी ग्राम बंगरा में स्वामी शरणानन्द जी सरस्वती महाविद्यालय हेतु भूमि प्राप्त हुयी थी। आज भी मौके पर एवं अभिलेखों मेें दर्ज है। परम पूज्य स्वामी शरणानन्द जी के 6 दिसम्बर 1982 को गौलोकवासी होने के  उपरान्त आश्रम की सम्पत्ति पर कब्जा करने के प्रयास शुरू हो गये। 
स्थानीय लोगो ने मिलकर पुनः आश्रम की उचित व्यवस्था के लिए एक संस्था का पंजीकरण कराया। पं. विश्वनाथ शर्मा को अध्यक्ष बनाया - तब से बहुत काम हुआ है। सभी मंदिरों का जिर्णोद्धार - रख रखाव व पूजा अर्चना हुयी है। सम्पत्ति की रक्षा हुई। आय बढ़ी है। कई नये निर्माण हुये है - पूज्य स्वामी जी की मूर्ति भी आ गयी है। और मूर्ति स्थान - गुम्बद - प्रवचन स्थान - मकान बन गये है। शीघ्र ही मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा हो जायेगी।