पं0 विश्वनाथ शर्मा हिन्दू धर्मार्थ न्यास

न्यास के सम्बन्ध में

न्यास संस्थापक 
डा0 पं0 विश्वनाथ शर्मा अपनी कलकत्ता और यू0एस0ए0(1956-1962) से प्राप्त शिक्षा की पृष्ठ भूमि और उधोग जगत में सक्रीयता के कारण संसाधनों की उपलब्धता के चलते बुन्देलखण्ड के उत्थान के लिए कार्यरत है। उनका मुख्य कार्य क्षेत्र शिक्षा एवं स्वास्थ्य रहा है।
पंडित  जी प्राथमिक शिक्षा से लेकर तकनीकि शिक्षा तक सभी वर्गो के बच्चों को प्रोत्साहित करने के अलावा कई  विधालयों, कालेजों और बुन्देलखण्ड विश्वविधालय के उत्थान एवं स्थापना में सहायक रहे है। पंडित विश्वनाथ शर्मा ने सीधे तौर से 6000 बालक-बालिकाओें की शिक्षा अपने  गैरलाभप्रद न्यासों द्वारा संचालित करते है एवं इन्होंने पिछले 40 वर्षो से 10000 बालक -बालिकाओं को करोड़ों रूपये से अधिक की सहायता राशि प्रदान कर प्राथमिक से परास्नातक एवं तकनीकि शिक्षा से जोड़ा है। पणिडत जी, श्री लक्ष्मीबाइ व्यायामशाला (जिसकी सम्पतित एवं मैदान मूल्य दो हजार करोड़), बैठने की आन्तरिक व्यवस्था (क्षमता 3000 व्यकित) और वाहय वयवस्था (क्षमता 20000 व्यकित) स्टेडियम आदि के माध्यम से सैकड़ो खेल कार्यक्रम आयोजित किये है।  
 

न्यास के क्रियाकलाप

''धनात धर्मम तत: सुखम को मूल मन्त्र बनाकर धार्मिक कार्यो में भी यत्र-तत्र-सर्वत्र आर्थिक सहयोग देने में न्यास के अध्यक्ष डा. पं. विश्वनाथ शर्मा जी अग्रणी भूमिका निभाते हैं। चाहे वह रथ यात्रा द्वारा धार्मिक जनजागरण हो या सिद्धेश्वर पीठ झाँसी, पीताम्बरा पीठ दतिया आदि कितनी ही सिद्ध संस्थाओं, व्यायामशाला, गौशाला, मनिदर, बुन्देली सांस्कृतिक संस्थाओं विशेषकर ब्राáण उत्थान सामूहिक विवाद के लिए आर्थिक सहयोग, न्यास के तत्वावधन में ये कार्य अनवरत रूप से चलते ही रहते है। निर्धन विधार्थियों को दैनिक उपयोग की वस्तुओं की सहयाता और जरूरतमंदो को बस्त्र भेंट कर न्यास ने सदैव पुण्य कार्यो में अपनी अग्रणी भूमिका निभाई है। प्राकृतिक आपदाओं लाटूर (महाराष्ट्र) गढ़वाल (उत्तराखंड) गुजरात के भूकम्प तथा गुजरात और बिहार में कोसी की बाढ़ व सुनाम आदि से प्रभावित लागों की सहायतार्थ दस लाख रूपया से आधिक का सहयोग दिया है। युवकयुवतियों को व्यवसायिक शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करे हेतु न्यास सुनियोजित कार्यक्रम के तहत विशेष आर्थिक सहायता प्रदान करता है। समाज के लगनशील, सफल व्यकितयों, कर्तव्यनिष्ठ और ईमानदारी कर्मचारियों, राष्ट्र के भविष्य निर्माता शिक्षकों को समय-समय पर न्यास द्वारा सम्मानित और पुरस्कृत किया जाता है।

कर्नल बी.डी. डंगवाल, (रिटायर्ड)
मानद सचिव
पं. विश्वनाथ शर्मा हिन्दू धर्मार्थ न्यास, झाँसी 
  पं. रमेश बिरथरे मानद प्रशासक का सर्वाधिक सम्बध रहा है।    


 

  न्यास के मुख्य कार्यकारी पं0 अनुराग शर्मा पुत्र पं0 श्री विश्वनाथ शर्मा बैधनाथ आयुर्वेद भवन के प्रशासनिक निदेशक के रूप में दो दशकों से कार्यरत है और विशेषत: कम्पनी की शाखा झाँसी के कार्य को आयुर्वेद व्यापार की शानदार ऊचाई पर ले गये है। बैधनाथ उत्पादों की उच्चगुणवत्ता एवं सुलभता के कारण ही बैधनाथ एक घरेलू जाना पहचाना नाम बन गया है एवं कई रोगों से मुकित दिला रहा है, परिणाम स्वरूप लोगों के सामान्य स्वास्थ्य में सुधार हो रहा है।
 
    श्री अनुराग जी को हिमाचल प्रदेश में एक उच्च तकनीकी प्लान्ट स्थापित करने में बड़ी सफलता मिली है। इसके अतिरिक्त उधोग क्षेत्र में श्री अनुराग शर्मा जी सफलतापूर्वक कई उधोगों एवं कम्पनियों को चला रहे है - यथा पीताम्बरा प्लासिटक, बैधनाथ शोध संस्थान लिमिटेड आदि बुन्देलखण्ड सेवा मण्डल के जीवन-पर्यन्त सदस्य श्री अनुराग शर्मा जी, पं0 विश्वनाथ शर्मा हिन्दू धर्मार्थ न्यास एवं रानी लक्ष्मीबाइ पबिलक स्कूल के प्रबंध न्यासी है। इसके अतिरिक्त वह कइ सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय है।
 

न्यास के प्रेरक

वैध पं. रामनारायण शर्मा जी

समाज सेवा एवं आयुर्वेद चिकित्सा ही जिनके जीवन का मूल उददेश्य

 
वैध जी ने देश में प्रथमबार संगछित रूप से बड़े स्तर पर आयुर्वेदीय औषधियों का निर्माण प्रारम्भ किया। वे वास्तव में भारत के आयुर्वेद उद्धारक कहे जा सकते हैं। बैधनाथ प्रतिष्छान ने देशभर में एजेनिसयों के माध्यम से गुणकारी औषधियां जन स्वास्थ्य लाभ व रोग मुकित के लिए भेजीं, इसके पूर्व बैधगण स्वयं ही थोडी बहुत शुद्ध सािनीय जड़ी-बूटी एकत्रित करके दवा बनाते थे और यह कार्य भी निरन्तर कठिन होता जा रहा था।
सन 1918-20 में बैधनाथ आयुर्वेद भवन की नींव डालकर और राष्ट्रीय आन्दोलन में भागीदारी करके आयुर्वेद को कांग्रेस के द्वारा राष्ट्रीय  चिकित्सा पद्धति घोषित कराकर आयुर्वेद के सबसे प्रचलित सर्वाधिक ग्रन्थों एवं प्रचार सामग्री छापी। स्वास्थ प्रदर्शनियो का आयोजन किया। वैधजी द्वारा आयुर्वेद की सर्वाधिक प्रचलित पुस्तक आयोग्य प्रकाश के हिन्दी, अंग्रेजी, मराठी, गुजराती, तेलुगू में 35 संस्कारण निकल चुके हैं व आयुर्वेद सारसंग्रह के बीस, क्रिया शरीर के ग्यारह, सिद्ध योग संग्रह के दस आदि।
बैधनाथ धर्मार्थ चिकित्सालय खत्रयाना झाँसी में सन 1952 से अब तक दस लाख से अधिक रोगियों की नि:शुल्क चिकित्सा हुई है।
बुन्देलखण्ड में सर्वाधिक शिक्षा संस्थान खेलने व प्रोत्साहन देने का श्रेय भी बैध जी व परिवार को ही जाता है। 1950-52 के अस्थायी मान्यता प्राप्त बुन्देलखण्ड कालेज की प्रबन्ध समिति में नगरपालिका अध्यक्ष डा मेहरा (स्वयं सचिव) बने व अन्य प्रमुख नागरिकों ने बैध जी को मनाया और अध्यक्ष बनाया कुछ ही वर्षो में कालेज प्रदेश की प्रमुख शिक्षा संस्था बन गया। इसी प्रकार डी.ए.वी. स्कूल, कन्हैया लाल स्वामी संस्कृत कालेज (स्वयं उपाध्यक्ष व प्रमुख दानदाता) व्यायामशाला इण्टर कालेज स्थापित किए। उन्ही की प्रेरणा से पं. विश्वनाथ शर्मा ने भी खेल व शिक्षा के क्षेत्र में क्रंतिकारी कार्य किये है। 
छात्रवृति  व अन्या विधालयों के हजारों बच्चों को यौग्यता के आधार पर भारी आर्थिक सहायता की है, और कर रहे हैं।
धर्मार्थ में पूज्य वैधजी ने मथुरा में अस्पताल को दान, हरिद्वार, चित्रकूट, वृन्दावन, छात्रवृति , बद्रीनाथ, झाँसी, दतिया, पुष्कार जी मातृभूमि (जयपुर जिला) में विधालय, मंदिर, पुस्तकालय, वाल्मीकि आश्रम, धर्मशालाएं, संस्कृत विधालयों की स्थापना/सहायता की । उसी प्रकार प्रकार वैध जी के ततीय व चतुर्थ पुत्र  पं. शिवनाथ शर्मा व सुरेश शर्मा ने दतिया, जयपुर, नागपुर आदि में आश्रम, मंदिर, धर्मशालायें आदि बनवाये है।
जनसेवा के क्रम में वैधजी के ज्येष्ठ पुत्र वैधनाथ के प्रबन्ध निदेशक पं. बृजेन्द्र कुमार शर्मा सन 1963 में झाँसी नगरपालिका अध्यक्ष, 1974 में डा. पं. विश्वनाथ शर्मा झाँसी परिषद अध्यक्ष व 1991 में सांसद हमीरपुर रहे हैं।
 

न्यास के संस्थापक

डा. पं. विश्वनाथ शर्मा जी डी.लिट

अपने पिता स्वर्गीय वैध रामनारायण शर्मा जी से विरासत में मिले सदगुणों और प्रेरण से उनके पुत्र डा. पं. विश्वनाथ शर्मा जी ने ''होनहार बिरवान के होत चीकने पात की उकित को यरितार्थ किया है। वैधराज के दूसरे पुत्र विश्वनाथ जी का जन्म 19 अक्टूबर, 1939 ई. को हुआ।
बी.काम कलकत्ता  से किया। तदुपरान्त सन 1959 से 1961 में बैधनाथ में काम का अनुभव करके 1961 मे अमेरिका गए। 1961 - 62 में अमेरिका के मियामी व मिसिगन विश्वविधालय में व्यापार की शिक्षा ग्रहण की। बैधनाथ प्रतिष्टान के कार्य को सम्भाला  और उसे आगे बढ़ाया। सन 1966 में मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हिन्दी भाषा में दैनिक मध्य देश समाचार पत्र का प्रकाशन किया, उसी श्रृृंखला में सन 1968 में झाँसी से भी इस पत्र का प्रकाशन हुआ।
वैध रामनारायण शर्मा अपने जीवन के आरम्भ से ही शिक्षा के विकास, प्रसार और प्रचार में रूचि रखते थे, सामाजिक और मानव सेवा की संस्थाओं से सम्बद्ध थे। अपने पिता के गुण पं. विश्वनाथ शर्मा जी ने ग्रहण किए।  झाँसी की अप्रतिम संस्था श्री लक्ष्मी व्यायाम मंदिर झाँसी का आज जो विशाल स्वरूप् है, उसके निर्माण में विश्वनाथ शर्मा जी और उनके पिताजी का अकथनीय योगदान है। यह उल्लेख करना महत्वपूर्ण है कि उक्त संस्था के उन्नयन हेतु वैधजी का पूरा परिवार पैत्रों तक की श्रृृंखला में सभी प्रकार से निरन्तर समर्पित है।
सन 1963 में श्री लक्ष्मी व्यायाम मंदिर में जिम्नासिटक की राष्ट्रीय चैमिपयनशिप प्रतियोगिता का उत्तर  प्रदेश में प्रथमस्वरूप् जिम्नासिटक फेडरेशन आफ इणिडया द्वारा श्री शर्मा स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया।  में हाकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद के नाम से भी गोल्ड कप हाकी टूर्नामेन्ट संयोजित किया। सन 1975 में पुन: झाँसी में राष्ट्रीय जिम्नासिटक चैमिपयनशिप आयोजित करवाई।
बुन्देलखण्ड में सैकड़ो की संख्या में आयोजित होने वाले शिवरात्रि, रामनवमी उत्सव, गणेश उत्सव, जन्माष्टमी और दुर्ग उत्सवों के भव्य आयोजनों का श्रेय भी श्री शर्मा जी को ही है।
नागरिकों के ज्ञानार्जन और स्वस्थ मनोरंजन के लिए 1974 में अध्यक्ष जिला परिषद बनते ही श्री शर्मा जी ने झाँसी में सन 1975 में बुन्देलखण्ड विकास प्रदर्शनी को पुनर्जीवित करके उसको पुन: आरम्भ किया, जो सन 1962 के बाद बन्द हो गई थी। प्रदर्शनी में अखिल भारतीय स्तर के लोकगीत, नृत्य और संगीत समारोह हुए। सन 1976 के बाद से यह प्रदर्शनी अब जिला परिषद के तत्वावधान में चल रही है।
सन 1980 में झाँसी से और पुन: 1991 में हमीरपुर से लोकसभा सदस्य चुने गए। बुन्देलखण्ड के चतुमुखी  विकास के लिए श्री शर्मा जी सदैव चिनितत और प्रयत्नशील रहे। सन 1970 में बुन्देलखण्ड एकीकरण संस्था की स्थापना  करके उत्तर  प्रदेश और मध्य प्रदेश के बुन्देलखण्ड क्षेत्र में सघन सम्पर्क और भ्रमण करके बुन्देलखण्ड को आगे बढ़ाने की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया।
श्री शर्मा जी जब सन 1975 में जिला परिषद के अध्यक्ष थे उस समय उत्तर  प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री हेमवती नन्दन बहुगुणा के वे बहुत नजदीकी व्यकितयों में थे, उन्हें प्रेरित करके श्री शर्मा जी ने झाँसी में ढ़ाई सौ करोड़ रूपये का भेल उधोग स्थापित  करवाने का महत्वपूर्ण निर्णय करवाया था, जो आज देश के शीर्ष उधोगों में है। डा. शर्मा जी ने जिला परिषद की आय बढ़ाई एवं सैकड़ो करोड़ो की संपत्ति  - सुन्दरपुरी बाग, पुलिस क्लब और अनाथालय आदि को अवैध कब्जे से मुक्त कराया। बुन्देलखण्ड में शिक्षा विकास हुआ झाँसी में 1983, दतिया में 1992 ललितपुर में 1993 में रानी लक्ष्मीबाई पबिलक स्कूल की स्थापना  की। यह देश व प्रदेश के सर्वश्रेष्ठ विधालयों में एक है। 
जब सन 1979 में दददा का स्वर्गवास हुआ तो उनकी स्मृति में हीरोज ग्राउड तथा स्टेडियम और दददा की मूर्ति की स्थापना की। पं. शर्मा जी संसद में दददा ध्यानचन्द्र का जन्म दिन 29 अगस्त 'खेल दिवस के रूप में स्वीकृत कराया। श्री शर्मा जी के प्रयासों के फलस्वरूप् दददा की पत्नी को एक लाख रूपये की नगद धनराशि की सहायता भी दिल्ली में एक समारोह में दी गई। एक लाख रूपये सरकार द्वारा भी दिए गए।
महोबा में चार सौ करोड़ की लागत का डी.आ.डी.ओ. का कार्य आरम्भ हुआ। हमीरपुर में श्री शर्मा जी ने पुरस्कार हेतु अपनी ओर से 11-11 हजार रूपये की राशि राजस्व व पुलिस विभाग में वितरित की। विभिन्न पुलों, सड़को व बिजली तथा विधालायों के लिए राशियां स्वीकृत कराई है। 
उधोग मंत्रालय की समिति के सदस्य होने के नाते संसद चलते ही पणिडत जी ने उदारीकरण पर सर्वाधिक जोर दिया था। संसद की रक्षा समिति के नाते राष्ट्रीय सुरक्षा के सभी पहलुओं पर अत्यन्त गंभीर चिन्तन कर महत्वपूर्ण योगदान किया है। पिछले 55 वर्षो में भारतीय सेना से उनकी निकटता जग -जाहिर है। उन्होने झाँसी-बबीना-कश्मीर आदि सेना क्षेत्र में विधालय निर्माण में बहुत योगदान दिया है। राष्ट्र प्रेम और अत्याधिक अनुशासन पणिडत जी के जीवन के अभिन्न अंग है।
पणिडत जी के द्वारा झाँसी में उनके द्वारा शिक्षा एवं औधोगिक क्षेत्र में किए गए उत्कृष्ट योगदान के फलस्वरूप बुन्देलखण्ड विश्वविधालय ने 1995 में उन्हें 'डी.लिट की मानद उपाधि से विभूषित किया है। डा. शर्मा जी ने उनके संचालित पं. विश्वनाथ शर्मा हिन्दू धर्मार्थ न्यास के तत्वावधान में आरक्षण पीडि़त एवं प्रतिभवा हजारें छात्रों को प्रोत्साहन राशि, शुल्क मुकित, सैनिक आश्रितों को प्रोत्साहन राशि तथा संस्कृत पाठशालाओं को सहायता और उच्च शिक्षा के लिए आर्थिक रूप से कमजोर विधार्थियों को आर्थिक सहायता के मद में अब तक 5 करोड़ रूपये प्रदान किए जा चुके है।
बुन्देलखण्ड के भामाशाह पणिडत विश्वनाथ शर्मा जी का विश्वास व कथन है कि पैसा तो गोबर की खाद है। एक जगह एकत्रित रहे तो सड़ंध व बीमारी उत्पन्न करता है। यही पैसा समाज के खेतों और बगीचों में खाद के रूप् में बिखेरने पर पैदावार करता है और समाज को सुरभि प्रदान करता है। लगभग 200 करोड़ की सार्वजनिक संपत्ति  श्री लक्ष्मी व्यायाम मंदिर की संपत्ति  रानी लक्ष्मीबाई पबिलक स्कूल आदि को खड़ा करने एवं उनको निरन्तर उन्नति की ओर अग्रसारित करते हुए शर्मा जी की प्रबल इच्छा है कि देश की प्रथम श्रेणी की शिक्षण संस्थाओं-व्यायामशालाओं- अस्पतालों का पूरे बुन्देलखण्ड में जाल बिछ जाए और सभी स्वावलम्बी बन सकें।
झाँसी के प्रसिद्ध सिद्धेश्वर मंदिर सलि को वर्तमान स्वरूप देने के मूल में पं. शर्मा जी रहे है। सन 1992 में श्री हरिओम पाठक के आग्रह पर लक्षचण्डी यज्ञ के 1995 में होने वाले समारोह की अध्यक्षता कर वर्षो लाखों रूपये की सहायता कर सिद्धेश्वर मंदिर परिसर को वर्तमान स्वरूप् दिलाने का श्रेय पणिडत जी को ही है। आजकल पणिडत जी की कृपा बुन्देलखण्ड विश्वविधालय पर विशेष रूप से रही है जिसमें कर्इ लाख रूपये की सहायता प्रदान की है एवं अपने स्वर्गीय पिता श्री रामनारायण शर्मा वैध जी की स्मृति में देश के प्रथम आयुर्वेदीय व समन्वय चिकित्सा पद्धति संस्थान का निर्माण किया है।
 

 

न्यास का संकल्प

सर्वे भवन्तु संखिन: संकल्प हमारा है।

बुन्देलखण्ड का हित हमको प्राणों से प्यारा है।।

शिक्षा, समाज सेवा, धर्मोत्थान हमारा नारा है।

प्रतिभाओं का प्रोत्साहन ही उददेश्य हमारा है।।

                                                     नारा....

हरी भरी सब धरती हो

भूमि न कोई परती हो।

बुन्देलखण्ड की धरती पर

बुन्देलखण्ड ही भरती हो।।

शिक्षित बुन्देलखण्ड

 विकसित बुन्देलखण्ड

 

वीर बुन्देलखण्ड 

 
जमुना तट से जबलपुर, गोवरधन से टोंस
धरा बुन्देली ना सही, कवहुँ काहू की धौंस
 
बुन्देलों की सुनो कहानी बुन्देलों की बानी में
पानी दार यहाँ का पानी आग यहाँ के पानी में।।
कैन धसान पहूज बेतवा पीते हैं चम्बल कौ जल
आठ पहर पहरे पै ठाड़ै सजग पहुरूवा विन्ध्याचल
शीश झुका कें ध्यान लगावें, विन्ध्येसुरी भवानी में
पानी दार यहाँ का पानी आग यहाँ के पानी में।।
हिम गिर ने विन्ध्याचल के सँग छल कौ प्रबल प्रमाण करौ
विन्ध्याचल ने वचन मान कें निज गुरू कौ सम्मान करौ
अबनों ठाड़ौ शीश झुकायें कुम्मज की अगवानी में,
पानी दार यहाँ का पानी आग यहाँ के पानी में।।
चित्रकूट में अवधपुरी के आके सीता राम रहे
जबनों रए बुन्देलखण्ड में तवनो पूरन काम रहे
छोड़ दियौ बुन्देलखण्ड तौ परे दोउ हैरानी में
पानी दार यहाँ का पानी आग यहाँ के पानी में।।
चन्देरी के शिशूपाल से कृष्णचन्द की ठनी रही
भले प्रान की हान हो गई आन शान की बनी रही
झब्बूदार पनइयाँ देखौ जिनकी मुकट निशानी में
पानी दार यहाँ का पानी आग यहाँ के पानी में।।
नगर महोबा आल्हा ऊदल दिल्ली के चौहान धनी
जियत जिन्दगी गढ़ महुबे पै लाल कमाने रहीं तनी
बान मुरक गये शब्दवेध के दाग लगौ चौहानी में
पानी दार यहाँ का पानी आग यहाँ के पानी में।।
पानी दार बुँदेला राजा छत्रशाल तलवार धनी
जीके मारे सीमा भीतर घुसन न पाई मुगल अनी
सुख की निदिया सोउन न पाओ शहंशाह जिंदगानी में
पानी दार यहाँ का पानी आग यहाँ के पानी में।।
सदा सबाये कौ सिर काटौ समर सूर हरदौल भये
आन राखबे पान करौ बिष जग में जस की बौल भये
हीरा सौ न मन धन खौदओ अपनों भरी जवानी में
पानी दार यहाँ का पानी आग यहाँ के पानी में।।
जिनके राज न सूरज डूबे नाव सुने से चौंक परैं
जइ झाँसी फिर फाँसी बनके अंगरेंजन के परी गरैं
दिखा परी काली झाँकी झाँसी बाली रानी में
पानी दार यहाँ का पानी आग यहाँ के पानी में।।
.....
 
जब छू जायेगी चिनगारी बुन्देलखण्ड के पानी में
तब भभक उठेगी क्रोध ज्वाल फिर झाँसी बासी रानी में
मत समझो रानी नहीं यहाँ जनजन झाँसी बासी तों हैं
झाँसी बाली रानी न सही रानी बाली झाँसी तो है।
 
 
- महाकवि अवधेश