ब्राह्मण याचक नहीं दाता

राजा के पुत्र को राज्य नीति, सेनापति के पुत्र को युद्ध कौशल - श्रेष्ठिवर्ग को व्यापार - का ज्ञान देने वाले ब्राह्मण याचक नहीं थे। समाज को उपरोक्त ऋणों से मुक्त करने के लिए है। भिक्षा लेने वर्ष में एक बार स्वयं जाते थे। अन्यथा प्रशिक्षुओं द्वारा ये सत्कार्य होता था। ऋषि - गुरू चाहते तो राजा-मंत्री-सेनापति द्वारा आश्रम की सारी व्यवस्थायें उच्च स्तर पर स्वयं हो सकती थी। पर गुरूकल का वातावरण-जंगल में कुटियों में रह कर - तपस्या करते एवं कराते हुए ही .. जीवन दर्शन ज्ञान प्राप्त हो रहा था।
    कालांतर में यह अब नष्ट हो गया और आज ब्राह्मण वास्तव में याचक की स्थिति में लाया जा रहा है। अधिकतर शिक्षक ब्राह्मण ही होते थे - पढ़े लिखे होने के कारण सरकारी कामों में भी नौकरियां मिलती थी। आरक्षण ने सब पर भारी प्रहार किया है। और तो और ठाकुर वंश के राजा मनु की व्यवस्था को भी ब्राह्मण व्यवस्था बता कर दोषित किया जाता है। गुजर-जाट-मीणा जैसी समर्थ जातियों ने भी अपने लिए आरक्षण करा लिया है। गरीब ब्राह्मण गरीब ही रह गया और दुरावस्था में जा रहा है। बाकी एक भी जाति नही है जिसकी आर्थिक-सामाजिक-राजनैतिक अवस्था में भारी उन्नति नहीं हुई हो। अपने गांव- मुहल्ले में आप स्वयं देख सकते है। इसके मूल में भी ब्राह्मण का बुद्विवादी होना है। शास्त्रार्थ करने वाले ज्ञानी बहुत कम एक मत हो पाते है। स्वतंत्रता की लड़ाई में भी सर्वाधिक ब्राह्मण आगे थे - इसलिए राष्ट्रीय नेता भी ब्राह्मण थे - पर आज स्थिति बिगड़ चुकी है। ब्राह्मणांे को नेता नहीं - पिछलग्गू बनाकर-वोट बैंक की तरह प्रयोग किए जाना इसके प्रमाण है। पं0 जवाहर लाल नेहरू के बाद केवल  पं0 अटल बिहारी बाजपेयी ही राष्ट्र नायक बन सके।
    आवश्यकता है कि सभी ब्राह्ममण निस्वार्थ भाव से अन्तर्मन में देखे और निश्चय करें। चुनावी अवसर पर सहायता करने वाला सेवा नहीं धोखे की भावना रखता है। इसका ध्यान रहे।
    न्यास बंचित ब्राह्मण बालकों, परिवारों की समग्र उन्नति को संकल्पित। सूखे की स्थिति में 2500 बोरे गेंहूँ और 10 हैण्डपम्प, टेंकरो फिर निशुल्क जल व्यवस्था ब्राह्मण मुहल्लों में, मंदिरों में भी जा रही है।
    विशेष योजना के अन्तर्गत इस वर्ष 20 लाख के विशेष प्रोत्साहन परीक्षा लेकर मेधावी छात्र प्रोत्साहित किए जायेगे।

आदर्श पुरूष

देश - काल को देख चले निजता नहिं खोवे,  सार वस्तु को कभी पाखण्डों में न डुबोये।
हमें चाहिए समझ - बूझ वाला वह पण्डित,   आँखंे ऊँची रखे कूप-मण्डूक न होवे।।

ऐंच-पेंच में कभी  सचाई को  न फँसावे,  लम्बी - चैड़ी बात बनाना जिसे न आवे।
हमें बात का धनी चाहिए  कोई ऐसा,  जो कुछ मुँह से कहे  वही करके दिखलाये।।
 
किसे असम्भव कहते है  यह समझ न पावे,  देख उलझनों का चितवन पर मैल न लावे।
हमें चाहिए धुन का पक्का  ऐसा प्राणी,  जो कर डाले उसे कि जिसमें हाथ लगावे।।

जिसके धन से खुलें  समुन्नति की सब राहें,  हो जावें वे काम  बिबुध जन जिन्हें सराहें।
हमें चाहिए सृजन  गाँठ का पूरा ऐसा,  जो पूरी कर सके  जाति की समुचित चाहें।।