हीरोज ग्राउण्ड, झाँसी की तथा-कथा

जिसे हीरोज ग्राउण्ड कहते हैं वह झाँसी के सीपरी बाजार में दददा के घर से 500 गज पर है वास्तव में कभी यह पूरा इलाका जंगल था। सन 1920 के आसपास थोड़ा सा क्षेत्र साफ करके मोहल्ले के बच्चे वहां खेलते थे। थोड़ा आगे चलकर लहर की माता का प्रसिद्ध मंदिर था। बाकी सब जंगल। सन 1965 के बाद वहां राजकीय कर्मचारियों की कालोनी बनी। उन्हीं में से तीन स्थान बीच-बीच में छूट गये। सबसे बड़ा स्थान वह था जिसमें हीरोज ग्राउण्ड था। 1970 के दशक के प्रारम्भ में वहां भी कालोनी बनाने का प्रस्ताव और स्वीकृति हो गर्इ।

हीरोज ग्राउण्ड पर भी खुदार्इ प्रारम्भ हो गयी है मकान बनने है। मैंने मना किया फिर हम सभी जिला अधिकारी के यहां गये। उन्हें स्थान का महत्व समझाया। हीरोज ग्राउण्ड बच गया। दददा अस्वस्थ हो गये। देश व हाकी के दुर्भाग्य से उनका स्वर्गवास हो गया। उनके पार्थिव शरीर को दिल्ली से झाँसी लाया गया - हैलीकाप्टर से। तत्कालीन नगर मजिस्ट्रेट श्री नागर ने सुझाया कि यदि आप हीरोज ग्राउण्ड बचाना चाहते हैं तो दददा का दाह संस्कार यहीं कर दीजिये - समाधि बना दीजिये।                मैंने परिवार वालों से बात की और घोषित कर दिया कि दददा का अनितम संस्कार यहीं हीरोज ग्राउण्ड में होगा। मरघटे से अतिरिक्त किसी भी सार्वजनिक स्थल पर किसी भी व्यकित का दाह नहीं हो सकता इसकी दलील मुझे दी गयी तो मैंने कहा कि गांधी जी, नेहरू जी आदि का संस्कार सार्वजनिक स्थल पर हो सकता है तो दददा किससे कम थे। इनका भी इतना ही राष्ट्रीय अन्र्तराष्ट्रीय महत्व है। इस तर्क के आगे कोर्इ नहीं बोल सका। इसके साथ ही उपसिथत हजारों लोगों ने एक स्वर से इस बात का समर्थन किया। अधिकारी भी निरूत्तर हो गये। सेना के अधिकारी व सेना की टुकड़ी द्वारा तोप गाड़ी पर दददा की शव यात्रा प्रारम्भ हुर्इ जो झाँसी में सीपरी बाजार का चक्कर लेकर हीरोज मैदान में पहुुंची। जहां आर्मी द्वारा गार्ड आफ आनर देने के बाद उनका दाह संस्कार पूर्ण वैदिक रीति से सम्पन्न हुआ। रात्रि भर हमने वहां भजन किये। प्रात:काल से ही समाधि स्थल की र्इटों की बाउण्डरी बना दी गर्इ और मूर्ति का आदेश सदर बाजार, झाँसी के मूर्तिकार श्री शिवचरण चौधरी को दिया गया। मूर्ति रखने के स्थान के दोनों तरफ चार - चार सीढि़यों वाले स्टैण्ड पत्थर व र्इंट से बना दिये गये। लगभग 1 हजार दर्शकों के बैठने की व्यवस्था की गयी। झाँसी रोटरी क्लब के सौजन्य से मूर्ति प्राप्त हुर्इ और स्थापित करके झाँसी के आर्मड डिवीजन के जर्नल श्री क्लेर द्वारा उसका उदघाटन 24 सितम्बर 1982 को विधिवत किया गया। पूरे निर्माण कार्य में सर्वाधिक सामग्री एवं द्रव्य की व्यवस्था मैंने की थी, पर मेहनत सबसे अधिक मुरली मनोहर शर्मा मंत्री एवं बिपिन बिहारी इण्टर कालेज के प्राचार्य श्री नरेन्द्र अत्री ने अपने सहयोगियों के साथ की।  
 
- डा0 पं0 विश्वनाथ शर्मा, डी.लिट, पूर्व सांसद