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ब्राह्मण याचक नहीं दाता

राजा के पुत्र को राज्य नीति, सेनापति के पुत्र को युद्ध कौशल - श्रेष्ठिवर्ग को व्यापार - का ज्ञान देने वाले ब्राह्मण याचक नहीं थे। समाज को उपरोक्त ऋणों से मुक्त करने के लिए है। भिक्षा लेने वर्ष में एक बार स्वयं जाते थे। अन्यथा प्रशिक्षुओं द्वारा ये सत्कार्य होता था। ऋषि - गुरू चाहते तो राजा-मंत्री-सेनापति द्वारा आश्रम की सारी व्यवस्थायें उच्च स्तर पर स्वयं हो सकती थी। पर गुरूकल का वातावरण-जंगल में कुटियों में रह कर - तपस्या करते एवं कराते हुए ही .. जीवन दर्शन ज्ञान प्राप्त हो रहा था।

यह प्रयास करके तो देखो...

देश की सबसे बड़ी विद्यार्थी संस्था (विद्यार्थी परिषद) ने 800 बच्चों को झांसी में पुरूस्कृत किया है। अच्छी बात है। पर ये इतनी बड़ी संस्था है कि इनके लिए 8 लाख भी कम है। मैं अकेला प्राणी 14000 को बांट चुका हूँ।
    आर0एल0पी0एस0 न्यास सर्वप्रथम देश के सर्वश्रेष्ठ विद्यालय के शिक्षक अर्थात सर्वश्रेष्ठ शिक्षकों की जिम्मेदारी है। इन्ही शिक्षकों के पढ़ाये बच्चे भारतीय संस्कृति में पूर्ण रूप से घुले अंग्रेजी मिशन वाले स्कूलों सेे बहुत आगे हैं। एक बड़ा अन्तर है। मैं परीक्षा लेकर कम्प्यूटरों के माध्यम से परीक्षा-फल तय करता हूँ।

दरवाजा खोलो सफलता खटखटा रही है

सन् 1962 में विश्व के सर्वोत्तम विश्वविद्यालयों से अमेरिका से व्यापार प्रबंधन की शिक्षा लेकर लौटा था।
    बैद्यनाथ तेजी पकड़ रहा था-पिताजी का इस ओर ध्यान देने का समय नहीं था आ0 भाई जी भी आयुर्वेद पढ़े थे निर्माण से ही फुर्सत नहीं थी।

देश के लाल - शास्त्री जी: मेरे संस्मरण

1964-65-66 में मैं बैद्यनाथ के हैड कार्यालय का इंचार्ज डायरेक्टर था। खबर लगी कि भारत पाकिस्तान युद्ध के बाद शान्ति वार्ता हेतु पूज्य शास्त्री जी रूस के शहर ताशकन्द गये थे। 11 जनवरी 66 में अचानक मृत्यु हो गई। शव दिल्ली लाया जा रहा है। कलकत्ता-दिल्ली हवाई जहाज की उड़ाने केवल 2-3 थी इसलिए जगह नहीं मिली। पता लगा कि विशेष विमान की व्यवस्था की जा रही है। प्रयास करने पर मुझे उसमें स्थान मिल गया। संयोग से उसी जहाज में  संघ प्रमुख पूज्य गुरू गोलवलकर भी थे। मैंने उनसे प्रणाम किया अपना परिचय वैद्य रामनारायण जी के द्वितीय पुत्र के रूप में दिया तो उन्होंने आर्शीवाद दिया। इसके बाद जब उन्होंने पूरे परिवार छोटे छोटे सुरेश, रमेश भाइयों के लिए भी नाम लेकर पूछ

बन्द के आह्वान से नहीं समस्याओं को हल करने से होगा बुन्देलखण्ड का विकास

15.03.2015 को पृथक बुन्देलखण्ड की मांग को लेकर लड़ रहे एक दल द्वारा बुन्देलखण्ड बन्द का आवाहन किया गया है। यह उचित नहीं है। बन्द का आम जनजीवन पर प्रभाव पड़ता है लोगों के दैनिक कार्य बन्द हो जाते हैं बच्चे स्कूल नहीं जा पाते नौकरी पेशा लोग अपने काम पर नहीं जा पाते मरीज इलाज से वंचित रह जाते है कई तो वाहन न मिलने के कारण दम तोड़ देते हैं दुकानेें बन्द हो जाती हैं देश व आम जन को आर्थिक हानि से गुजरना पड़ता है। इस तरह के आन्दोलन कभी कभी बेलगाम होकर हिंसात्मक रूप ले लेते है जिससे सरकारी व निजी सम्पत्तियों का नुकसान होता है तथा लोगों के जानोमाल की भी हानि होती है। आम नागरिक को परेशानियों का सामना करना पड़ता है। अतः यह समस्या का हल न होकर लोगों की

गणमान्य बन्धुओं एवं बहिनों आज स्वतंत्रता दिवस के 67वें वर्षगाँठ पर राष्ट्रीय पर्व माने का गौरव अनुभव कर रहे है

आज स्वतंत्रता दिवस के 67वें वर्षगाँठ पर राष्ट्रीय पर्व माने का गौरव अनुभव कर रहे है यह ऐतिहासिक संयोग की बात है कि स्वतंत्रता की ऐतिहासिक शहीद वीरांगना लक्ष्मीबाई की स्मृति  मैं सम्माननीय श्री विश्वनाथ शर्मा जी द्वारा संस्थापित रानी लक्ष्मीबाई ग्रुप आॅफ पब्लिक स्कूल क्षेत्र की प्रतिभावान छात्रों को विभिन्न विषयों का ज्ञान प्रकाश दे रहे है वीरांगना लक्ष्मीबाई ने पूरे देश में स्वतंत्रता के लिये अलख जगाई थी। आत्म बलिदान देकर अमरत्व प्राप्त किया था। इसके पश्चात देशवासियों के हृदय में स्वतंत्रता को एक ऐसी लौ जागृत हुयी जिसमें हजारों अमर शहीदों ने अपने प्राणों की बलि देकर 15 अगस्त 1947 को देश को स्वतंत्रता का गौरव प्रदान किया।

अंतत: यों राष्ट्रीय खेल दिवस घोषित हुआ 29 अगस्त

हमीरपुर के तत्कालीन सांसद और ध्यानचंद मैमोरियल सोसाईटी, झाँसी के अध्यक्ष, डा0 पं0 विश्वनाथ शर्मा (डी.लिट) ने 24 अगस्त 1994 को लोकसभा में सरकार से दददा के जन्म दिवस, 29 अगस्त को राष्ट्रीय खेल दिवस घोषित करने की मांग की। इस पर तत्कालीन खेलमंत्री श्री मुकुल वासनिक ने इस प्रस्ताव की सराहना करते हुए, इस सम्बन्ध में औपचारिकतायें पूरी होते ही, 29 अगस्त को राष्ट्रीय खेल दिवस घोषित करने का आश्वासन दिया। 24 अगस्त 94 को सम्पन्न हुई लोकसभा की कार्रवार्इ से तत्सबंधी चर्चा के अंश यहां प्रस्तुत हैं:-

हीरोज ग्राउण्ड, झाँसी की तथा-कथा

जिसे हीरोज ग्राउण्ड कहते हैं वह झाँसी के सीपरी बाजार में दददा के घर से 500 गज पर है वास्तव में कभी यह पूरा इलाका जंगल था। सन 1920 के आसपास थोड़ा सा क्षेत्र साफ करके मोहल्ले के बच्चे वहां खेलते थे। थोड़ा आगे चलकर लहर की माता का प्रसिद्ध मंदिर था। बाकी सब जंगल। सन 1965 के बाद वहां राजकीय कर्मचारियों की कालोनी बनी। उन्हीं में से तीन स्थान बीच-बीच में छूट गये। सबसे बड़ा स्थान वह था जिसमें हीरोज ग्राउण्ड था। 1970 के दशक के प्रारम्भ में वहां भी कालोनी बनाने का प्रस्ताव और स्वीकृति हो गर्इ।

नये बुन्देलखण्ड में आरक्षण प्रोन्नति, योग्यता और पिछड़ापन जाति नहीं

बुन्देलखण्ड एकीकरण समिति ने हमीरपुर के पूर्व लोक सभा सांसद श्री गंगाचरण राजपूत के बुन्देलखण्ड प्रान्त निर्माण के लिए संकल्प का स्वागत किया था और कहा था कि अच्छा हो कि वे आंदोलन को सफल बनाने के लिए अपने प्रमुख कार्य क्षेत्र हमीरपुर-महोबा से ही प्रारम्भ करें तो सफलता शीघ्र मिलेगी।
26 अगस्त के समाचार पत्रों से ज्ञात हुआ कि श्री राजपूत पिछड़ों के लिए आरक्षण की मांग तो कर रहे हैं पर यह भी कह रहे हैं कि आरक्षण के कारण 15-20 प्रतिशत ऊँची जातियां ही हैं जो 80 प्रतिशत पिछड़े और दलित समूहों के अधिकार छीन रही है।